दिल्ली नगर निगम (MCD) की 12 वार्ड कमेटियों के चुनाव को लेकर इस सप्ताह बड़ा फैसला सामने आ सकता है। संभावना जताई जा रही है कि चुनावों की तारीखों की घोषणा कभी भी की जा सकती है। एमसीडी की ओर से इससे पहले दो बार इन चुनावों की तिथियों में बदलाव किया जा चुका है। बाद में प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था, जिससे राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी।

निगम के पदाधिकारियों का कहना है कि अधिमास (अतिरिक्त माह) समाप्त होने के बाद 15 जून के बाद ही चुनाव कराए जाने पर विचार किया जा सकता है। एमसीडी में प्रावधान है कि हर वर्ष वार्ड कमेटियों के साथ-साथ स्थायी समिति के चेयरमैन और डिप्टी चेयरमैन का भी चुनाव होना चाहिए। लेकिन एकीकरण के बाद वर्ष 2023 में ये चुनाव होने थे, जो अब तक नहीं हो पाए हैं। इस बीच, आरोप है कि उस समय आप सरकार ने स्थायी समिति में बहुमत को लेकर स्थिति स्पष्ट न होने के कारण कमेटियों का गठन नहीं किया, जिसके बाद यह मामला कानूनी विवाद में भी पहुंच गया और सुप्रीम कोर्ट तक गया।

वर्ष 2024 में इन चुनावों को लेकर एक अलग व्यवस्था अपनाई गई थी, जब तत्कालीन आप सरकार के महापौर के आदेश के खिलाफ जाकर उपराज्यपाल (LG) की मंजूरी से जोन के उपायुक्तों को पीठासीन अधिकारी बनाकर चुनाव कराए गए थे। अब एक बार फिर चुनावों की संभावित घोषणा को लेकर पार्षदों में उत्सुकता बढ़ गई है। कई पार्षदों को उम्मीद है कि इस बार उन्हें वार्ड कमेटियों में चेयरमैन और डिप्टी चेयरमैन जैसे महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी मिल सकती है।

पहले ये चुनाव 23 मई को प्रस्तावित थे, फिर तारीख बदलकर 29 मई कर दी गई थी, लेकिन बाद में इन्हें अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया। सूत्रों के अनुसार, एमसीडी की 12 वार्ड कमेटियों में से आठ में भाजपा का बहुमत है। ऐसे में पार्टी दो जोनों में चेयरमैन और डिप्टी चेयरमैन पद हासिल करने की रणनीति पर काम कर रही है। नियमों के मुताबिक, वार्ड कमेटियों और स्थायी समिति का कार्यकाल हर साल 31 मार्च को समाप्त हो जाता है, लेकिन नए चुनाव न होने की स्थिति में मौजूदा पदाधिकारी तब तक बने रहते हैं जब तक नई व्यवस्था लागू नहीं हो जाती। एक अप्रैल के बाद होने वाली कमेटी बैठकों में चुनाव कराने का प्रावधान भी है, जिसके चलते अब जल्द चुनाव की नई तारीख तय होने की संभावना जताई जा रही है।

दिल्ली नगर निगम (MCD) की वार्ड कमेटियों का कार्यकाल खत्म हुए करीब ढाई माह होने जा रहा है, जिसके चलते इन कमेटियों की नियमित बैठकें भी नहीं हो पा रही हैं। इस स्थिति का सीधा असर स्थानीय प्रशासन और नागरिक सेवाओं पर पड़ रहा है। पार्षदों का कहना है कि बैठकों के अभाव में क्षेत्रीय स्तर पर समस्याओं का समाधान समय पर नहीं हो पा रहा है, जिससे जनता की शिकायतों के निपटारे में देरी हो रही है। सफाई, जल निकासी और अन्य स्थानीय मुद्दों पर भी निर्णय प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। इसके साथ ही स्थायी समिति जैसी महत्वपूर्ण इकाई का गठन न होने के कारण कई विकास परियोजनाएं भी अटकी हुई हैं। बताया जा रहा है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया बाधित होने से नए कार्यों की स्वीकृति और फंडिंग में भी देरी हो रही है।

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