उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 13 साल पुराना वह विवाद सुर्खियों में है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार ने आतंकियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की पहल की थी. अब योगी सरकार में मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने उसी मुद्दे को फिर से उठाकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर बड़ा राजनीतिक हमला बोला है.

शनिवार को राजभर ने सोशल मीडिया पर 6 जून 2013 की एक खबर का स्क्रीनशॉट साझा किया. यह वही तारीख थी, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले पर सपा सरकार से कड़े सवाल पूछे थे. राजभर ने इस पुराने मामले का जिक्र करते हुए अखिलेश यादव पर निशाना साधा और कहा कि जनता को सपा सरकार के ऐसे फैसले कभी नहीं भूलने चाहिए.

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क्या था पूरा मामला?

साल 2012 में समाजवादी पार्टी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे. विधानसभा चुनाव के दौरान सपा ने वादा किया था कि आतंकवाद के मामलों में फंसाए गए मुस्लिम युवकों के मामलों की समीक्षा कराई जाएगी और उनके मुकदमे वापस लिए जाएंगे.

सरकार बनने के बाद इसी वादे के तहत कुछ मामलों की समीक्षा शुरू हुई। वर्ष 2013 में अखिलेश सरकार ने 2007 के लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी सीरियल ब्लास्ट से जुड़े आतंकियों के मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की. इन धमाकों में कई लोगों की जान गई थी और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे. जैसे ही सरकार का यह फैसला सामने आया, इस पर राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया.

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हाईकोर्ट ने लगाई फटकार?

सरकार के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. 6 जून 2013 को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सपा सरकार से पूछा कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में मुकदमे वापस लेने का आधार क्या है? अदालत ने सरकार से आरोपियों की सूची मांगी और यह भी जानना चाहा कि क्या इस संबंध में केंद्र सरकार से आवश्यक अनुमति ली गई है. अदालत ने साफ कहा कि आतंकवाद से जुड़े मामलों को सामान्य आपराधिक मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता. बाद में दिसंबर 2013 में हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यूएपीए, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और देश के खिलाफ युद्ध जैसे गंभीर मामलों में अभियोजन वापस लेने के लिए केंद्र सरकार की सहमति जरूरी है. अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमे वापस लेने के लिए असाधारण और ठोस कारण होने चाहिए.

‘आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे क्या?’

सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियां भी काफी चर्चा में रही थीं. हाईकोर्ट ने सरकार के रुख पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि आज आप आतंकियों के मुकदमे वापस ले रहे हैं और कल उन्हें पद्म भूषण दे देंगे? अदालत ने कहा था कि यदि सरकार इस तरह आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेगी तो इससे गलत संदेश जाएगा. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष, इसका फैसला अदालत करेगी, सरकार नहीं.

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संभल दंगों के आरोपियों का भी मुकदमा लिया था वापस

ये पहला मौका नहीं था जब सपा सरकार के फैसलों पर इस तरह के सवाल उठे हों. साल 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी संभल में 1978 में हुए दंगे के आरोपियों के भी मुकदमे वापस लिए थे. इस दंगे में सैकड़ों लोगों की हत्या हुई थी और कई हिंदुओं के मकानों और पूजा स्थलों को आग लगा दिया गया था.

अब राजभर ने उठाया यह मुद्दा

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से ओमप्रकाश राजभर लगातार अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर हमलावर हैं. खासकर सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को लेकर वह लगातार सवाल उठा रहे हैं. राजभर का आरोप है कि समाजवादी पार्टी केवल वोट बैंक की राजनीति करती है और गैर-यादव पिछड़ी जातियों को केवल चुनावी इस्तेमाल तक सीमित रखती है. इसी राजनीतिक लड़ाई के बीच राजभर ने 2013 के आतंकवाद मामलों का विवाद फिर से सामने रखा है. अपने सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने लिखा कि 6 जून की तारीख इसलिए याद रखनी चाहिए क्योंकि इसी दिन हाईकोर्ट ने आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले पर सपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था. राजभर ने तंज कसते हुए कहा कि 2027 के चुनाव में हार की वजह तलाशने से पहले अखिलेश यादव को अपने शासनकाल के फैसलों को याद कर लेना चाहिए. उन्होंने “सपा का गढ़, आतंकवाद की जड़” जैसे तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया.