पटना। बिहार के राजभवन और शैक्षणिक संस्थानों के बीच चल रहे प्रशासनिक तनाव के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। राज्यपाल-सह-कुलाधिपति सचिवालय (लोकभवन) ने आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी (AKU) के कुलपति के खिलाफ बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की है। राजभवन ने कुलपति के तमाम नीतिगत और वित्तीय अधिकारों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। यह कड़ा कदम विश्वविद्यालय प्रशासन और जांच समिति के बीच उपजे तीखे विवाद के बाद उठाया गया है।

​लोकभवन के तीन कड़े निर्देश और प्रतिबंध

​राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह द्वारा 15 सितंबर 2026 को जारी आधिकारिक आदेश के तहत कुलपति को तीन मुख्य प्रतिबंधों का पालन करना होगा:

  • ​नीतिगत फैसलों पर रोक: अगले आदेश तक कुलपति कुलाधिपति की पूर्व अनुमति के बिना विश्वविद्यालय से जुड़ा कोई भी नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। किसी भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले के लिए अब लोकभवन की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।
  • ​वित्तीय अधिकारों पर कड़ा नियंत्रण: रोजमर्रा के सामान्य प्रशासनिक खर्चों को छोड़कर किसी भी प्रकार की वित्तीय स्वीकृति या बड़े वित्तीय निर्णय बिना राजभवन की सहमति के जारी नहीं किए जा सकेंगे।
  • ​मुख्यालय छोड़ने पर पाबंदी: आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि कुलपति कुलाधिपति की पूर्व अनुमति के बिना अपना विश्वविद्यालय मुख्यालय नहीं छोड़ सकते हैं। इन सभी निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है।

​जांच समिति के गठन से बढ़ा प्रशासनिक विवाद

​इस पूरी कार्रवाई के पीछे एकेयू में एक उच्च स्तरीय जांच समिति के गठन को लेकर चल रहा गंभीर विवाद है। कुछ दिनों पहले विश्वविद्यालय प्रशासन ने उक्त जांच समिति की गठन प्रक्रिया, उसके अधिकार क्षेत्र और जांच की समय-सीमा पर सवाल उठाते हुए राजभवन को आधिकारिक पत्र भेजा था, जिससे दोनों पक्षों के बीच दूरियां बढ़ गईं।

​कुलसचिव के गंभीर आरोप और धमकियों का मामला

​विवाद उस समय और गहरा गया जब विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. नीरंजन प्रसाद यादव ने जांच समिति के समन्वयक एवं उच्च शिक्षा विभाग के विशेष सचिव पवन कुमार सिन्हा पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। कुलसचिव द्वारा भेजे गए पत्र में दावा किया गया कि जांच के दौरान संबंधित अधिकारी ने प्रशासनिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर अमर्यादित व्यवहार किया और आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया।
​पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि कुलसचिव को कथित तौर पर हाथ तुड़वाने की धमकी जैसी भाषा का सामना करना पड़ा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस घटना को अत्यंत गंभीर मानते हुए आरोपी अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की मांग की है, जिसके बाद राजभवन ने यह निर्णायक कदम उठाया है।