प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला अदालतों में मुकदमों की धीमी रफ्तार और जिला न्यायपालिका की ओर से मांगी गई जानकारी उपलब्ध न कराने पर गंभीर चिंता जताई है. न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने चार याचिकाओं की सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि लंबे समय तक मुकदमों का लंबित रहना किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवहार का नतीजा है.
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20 साल तक आरोप तय न होना चिंता का विषय
कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में 20 साल से अधिक समय तक आरोप तय नहीं होना और कुछ मुकदमों का 40 साल से ज्यादा समय तक चलना न्यायिक संस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है. कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में मुकदमों की सुनवाई समयबद्ध तरीके से पूरी करने की जरूरत है.
16 साल में 178 से ज्यादा तारीखें
मामलों में प्रयागराज के नैनी थाने से जुड़ा 2009 का उर्मिला मिश्रा मामला भी शामिल है. इसमें 16 साल के दौरान 178 से अधिक बार सुनवाई हुई, लेकिन आरोप तय नहीं हो सके. सरफराज अहमद के मामले में 2008 में एफआईआर और 2010 में चार्जशीट दाखिल होने के बाद करीब 143 तारीखें पड़ चुकी हैं, फिर भी कार्यवाही आगे नहीं बढ़ी.
चेक बाउंस केस में 100 से ज्यादा तारीखें
वीएस पालीट्यूब से जुड़ा 2013 का 59 हजार रुपये के चेक बाउंस का मामला भी कोर्ट के सामने आया. इस मामले में 100 से अधिक तारीखें लग चुकी हैं. कोर्ट के मुताबिक आरोपी नियमित रूप से पेश नहीं हुआ. हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी हर तारीख पर अदालत में उपस्थित हो.
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रिकॉर्ड डिजिटलीकरण और समयबद्ध सुनवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने उर्मिला मिश्रा और सरफराज अहमद के मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाने का निर्देश दिया. बार-बार छूट की अर्जियों पर रोक, जरूरत पड़ने पर जमानत बांड जब्त करने और समन-वारंट की तामील में लापरवाही करने वाले पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए.
पालीट्यूब मामले में आरोपी की मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए कानपुर नगर के एसएसपी को निर्देश दिया गया. कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को न्यायालय के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण सुनिश्चित करने को भी कहा है.

