Vande Mataram Row Rajasthan: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के चित्तौड़गढ़ दौरे में वंदे मातरम को लेकर दिए गए बयान के बाद राजस्थान की राजनीति गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने शाह के बयान पर पलटवार करते हुए भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा।
गहलोत ने 1896 के कांग्रेस अधिवेशन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक वंदे मातरम से जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम का जिक्र किया और आरोप लगाया कि भाजपा सत्ता में आने के बाद इतिहास को अपने तरीके से पेश करने की कोशिश कर रही है।

अमित शाह ने क्या कहा था?
अमित शाह ने रविवार को चित्तौड़गढ़ में अपने संबोधन के दौरान कांग्रेस पर वंदे मातरम के मुद्दे को लेकर निशाना साधा था। उन्होंने दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान वंदे मातरम के गायन से जुड़े घटनाक्रम का जिक्र किया। शाह ने आरोप लगाया कि जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना वंदे मातरम का गायन हो रहा था, तब सोनिया गांधी ने कथित तौर पर मल्लिकार्जुन खरगे को गाना रोकने का इशारा किया। उन्होंने इसे कांग्रेस की तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस से माफी मांगने की मांग की।
गहलोत बोले, इतिहास के पन्ने भाषणों से नहीं बदलते
अमित शाह के बयान पर अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि चित्तौड़गढ़ में शाह का वंदे मातरम पर भाषण सुनकर इतिहास के जानकारों को हंसी आई है। गहलोत ने आरोप लगाया कि भाजपा और आरएसएस का वंदे मातरम से कभी संबंध नहीं रहा। उन्होंने कहा कि सत्ता में आने के बाद इतिहास पर प्रवचन देना उनके अपराध बोध को दिखाता है। गहलोत ने यह भी कहा कि भाषणों के जरिए इतिहास के पन्ने नहीं बदले जा सकते और देश की जनता सच्चाई जानती है।
गहलोत ने गिनाए वंदे मातरम से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य
अशोक गहलोत ने अपनी पोस्ट में वंदे मातरम के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि 1896 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार वंदे मातरम गाया था। गहलोत के अनुसार 1905 के बाद यह कांग्रेस के अधिवेशनों की महत्वपूर्ण परंपरा बन गया। उन्होंने दावा किया कि स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के विरोध के दौरान वंदे मातरम का उद्घोष जारी रखा। उन्होंने 1937 के घटनाक्रम का भी जिक्र किया। गहलोत के मुताबिक रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह के बाद वंदे मातरम के शुरुआती हिस्से को सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य बनाने पर जोर दिया गया।
RSS को लेकर भी गहलोत ने उठाए सवाल
गहलोत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने 1925 में आरएसएस के गठन से लेकर 1947 में देश की आजादी तक के कालखंड का जिक्र करते हुए दावा किया कि संघ ने वंदे मातरम को अपना आधिकारिक गीत नहीं बनाया। गहलोत ने यह भी आरोप लगाया कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था, तब आरएसएस इस आंदोलन से दूर रहा।
वंदे मातरम को लेकर क्या है पुराना विवाद?
वंदे मातरम की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रवादी भावना का महत्वपूर्ण प्रतीक बना। हालांकि, गीत के सभी पदों को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस रही है। 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम के शुरुआती दो पदों को स्वीकार किया था। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि शुरुआती पदों में मातृभूमि की वंदना है, जबकि बाद के पदों में धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख आता है। इसी संदर्भ में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह का भी उल्लेख किया जाता है कि शुरुआती दो पद सभी धर्मों के लोगों के लिए स्वीकार्य हो सकते हैं।
1950 में वंदे मातरम को मिला राष्ट्रगीत का दर्जा
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि जन गण मन देश का राष्ट्रगान होगा, जबकि वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाएगा। वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान सम्मान दिए जाने की बात भी कही गई थी। इसी फैसले को लेकर आज भी राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं।
BJP और कांग्रेस का अलग-अलग पक्ष
भाजपा और संघ विचारधारा से जुड़े लोग लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि 1937 में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो पदों को स्वीकार करना तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण था। वहीं कांग्रेस का पक्ष रहा है कि देश की धार्मिक और सामाजिक विविधता को देखते हुए सभी समुदायों की स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए शुरुआती दो पदों को अपनाने का फैसला किया गया था। वंदे मातरम को लेकर अमित शाह और अशोक गहलोत के ताजा बयानों ने इसी पुराने राजनीतिक और ऐतिहासिक विवाद को एक बार फिर राजस्थान की सियासत के केंद्र में ला दिया है।
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