रायपुर। राजनीति के समकालीन दौर में जहां सार्वजनिक संवाद का स्तर अनियंत्रित भाषा और सोशल मीडिया के अमर्यादित ट्रोल वॉर तक सिमट कर रह गया है, वहीं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बेहद दुर्लभ तस्वीर सामने आई है। रायपुर प्रेस क्लब के खुले मंच पर प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के बीच लगभग एक घंटा बीस मिनट तक चली सीधी बहस की घटना ने पूरे देश में लोकतांत्रिक विमर्श के लिए एक नई नजीर पेश की है।
इस ऐतिहासिक बहस की सबसे उल्लेखनीय बात दोनों नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनके द्वारा दिखाया गया साहस रहा। एक ओर विजय शर्मा हैं, जो पहली बार चुनकर विधानसभा पहुंचे हैं और अपने पहले ही कार्यकाल में उपमुख्यमंत्री जैसे भारी भरकम पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनके लिए यह बहुत आसान था कि वे एक पूर्व मुख्यमंत्री को आंकड़ों का हवाला देते हुए खारिज कर देते, लेकिन उन्होंने न केवल इस खुली चुनौती को स्वीकार किया, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ मंच पर डट गए।
वहीं दूसरी ओर भूपेश बघेल का राजनीतिक बड़प्पन भी सामने आया। पांच बार के विधायक और तीन दशकों का संसदीय अनुभव रखने वाले कद्दावर नेता अमूमन पहली बार के विधायक की ऐसी चुनौतियों को कद में छोटा बताकर खारिज कर देते हैं लेकिन बघेल ने किसी राजनीतिक अहंकार को आड़े नहीं आने दिया और प्रेस क्लब पहुंचकर यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में पद और वरिष्ठता से ऊपर जनता के सवालों का सम्मान होता है।

इस सियासी बिसात पर दोनों ही ओर से आंकड़ों की गूंज सुनाई दी। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा सरकार की घोषणाओं को सिलसिलेवार जोड़कर एक बेहद तार्किक और बुनियादी सवाल खड़ा किया। उन्होंने याद दिलाया कि रमन सरकार और कांग्रेस शासनकाल के पुराने 18 लाख स्वीकृत आवासों के बाद नई सरकार ने अपनी पहली ही कैबिनेट में 18 लाख नए आवासों की घोषणा की थी। इसके बाद लगातार लाखों नए आवास स्वीकृत करने के दावे किए गए। बघेल का गणितीय तर्क था कि यह पूरा जोड़ 46 लाख आवास का बैठता है और जब जल जीवन मिशन के आंकड़ों के मुताबिक पूरे राज्य में कुल 50 लाख परिवार ही हैं, तो क्या राज्य के नब्बे प्रतिशत से अधिक लोगों को पक्के मकान स्वीकृत हो चुके हैं? उन्होंने सरकार पर एक ही डेटा को बार-बार नया बताकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया और बताया कि उनके कार्यकाल में काम इसलिए प्रभावित हुआ, क्योंकि केंद्र ने पोर्टल बंद कर दिया था और कोरोना काल में फंड रोक दिया था।
दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस 46 लाख के गणित को भ्रामक और काल्पनिक बताते हुए बेहद आक्रामक पलटवार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक और पारदर्शी आंकड़ा 11 लाख 75 हजार आवासों का है, जो भारत सरकार के पोर्टल पर सबके लिए सार्वजनिक है। शर्मा ने वित्तीय तुलना का सबसे मारक अस्त्र चलाते हुए कहा कि कांग्रेस ने अपने पांच साल के कार्यकाल में केवल 3,900 करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृति दी थी, जबकि भाजपा सरकार ने पिछले ढाई वर्षों में ही गरीबों के आवास के लिए 16,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। उन्होंने कांग्रेस द्वारा चुनाव से ठीक पहले सात लाख आवास स्वीकृत करने के दावे की भी हवा निकालते हुए कहा कि असल में केवल 84 हजार लोगों के खातों में ही सांकेतिक राशि पहुंची थी और बाकी का डेटा तो पोर्टल पर अपलोड ही नहीं किया गया था।
यह पूरी परिचर्चा केवल चुनावी जीत-हार या दावों का अखाड़ा नहीं थी, बल्कि इसने संघीय ढांचे की उस दुखती रग को भी छू लिया, जहां अक्सर जनकल्याणकारी योजनाएं केंद्र बनाम राज्य के राजनीतिक टकराव की बलि चढ़ जाती है। सिर पर पक्की छत किसी भी नागरिक का बुनियादी अधिकार है, लेकिन जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं, तो कभी पोर्टल बंद होने का रोना रोया जाता है, तो कभी राज्यांश न देने के आरोप लगते हैं। इस बहस ने यह उजागर किया कि दोनों दलों की राजनीतिक खींचतान के बीच पिसता वही गरीब है, जो बारिश में टपकती छत के नीचे बैठकर सरकारी किश्त का इंतजार करता है।
कुल मिलाकर अमेरिका जैसे पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में प्रेसिडेंशियल डिबेट्स की जो परंपरा दशकों से स्थापित है, उसकी एक सफल झलक छत्तीसगढ़ में देखने को मिली है। आरोप-प्रत्यारोप और दस सेकंड की रील वाली राजनीति के इस दौर में छत्तीसगढ़ ने पूरे देश को यह दिखाया है कि मतभेदों के बावजूद दो घोर विरोधी दल एक ही मेज पर सभ्य तरीके से बैठ सकते हैं और जुमलों से हटकर आंकड़ों पर बात कर सकते हैं। इस बहस में किसका पलड़ा भारी रहा, यह लोग अपने-अपने नजरिए से तय कर सकते हैं, लेकिन यदि भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी स्कूलों की बदहाली, युवाओं के रोजगार और किसानों की समस्याओं पर भी नेता इसी तरह पारदर्शी और तथ्यपरक बहस करने लगें तो लोकतंत्र की तस्वीर यकीनन बहुत उजली हो सकती है।
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