विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाने वाला केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह उस प्रकृति के लिए कृतज्ञता जताने का दिन है, जिसने हमें जीवन दिया है. यह दिवस हमें स्मरण दिलाता है कि पृथ्वी केवल हमारे रहने-बसने का स्थान नहीं, बल्कि हमारी माता है. यहां के जंगल, पहाड़, नदियां, झीलें, जीव-जंतु और संपूर्ण प्राकृतिक संसाधन मानव और उसके अस्तित्व का आधार स्तंभ हैं. यदि प्रकृति सुंदर और स्वस्थ रहेगी, तभी मानव सभ्यता भी दीर्घकाल तक सुरक्षित रह पाएगी.

मानवता के भविष्य के लिए भी गंभीर चेतावनी
आज हम अपने चारों ओर देखते हैं तो विकास की चकाचौंध के पीछे पर्यावरण का दर्द स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होने लगता है. विकास के दौड़ में जंगलों को लगातार काटा जा रहा है, बढ़ते औद्योगीकरण और मानव दबाव से नदियां प्रदूषित हो रही है, भूगर्भीय जल का स्तर लगातार घट रहा है और वायुमंडल में खतरनाक रासायनिक जहर घुलता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम चक्र बदलने लगा है, जिसका आम जनजीवन पर नकारात्मक असर हो रहा है. कहीं भीषण गर्मी से लोगों का जीना मुहाल हो गया है, तो कहीं बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं आम होती जा रही है. यह सब सिर्फ प्रकृति के लिए संकट नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए भी गंभीर चेतावनी है.

आने वाली पीढियां हमसे जरूर पूछेंगे
विडंबना देखिये कि जिस प्रकृति ने हमें इतना खूबसूरत जीवन दिया है, उसी के साथ हमने सबसे ज्यादा अन्याय किया है. आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने पेड़ों को काटा, नदियों को कचरे का ढेर बनाया और धरती का सीना चीरकर संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है. नतीजा ये हो रहा है कि आज शुद्ध हवा, साफ सुथरा पेयजल और ऑक्सीजन युक्त हरियाली जैसी मूलभूत आवश्यकताएं दुर्लभ होती जा रहीं हैं. आने वाली पीढियां हमसे जरूर पूछेंगे कि जब मानव जीवन पर खतरे के स्पष्ट संकेत थे, तब आपने प्रकृति को सुरक्षित रखने के लिए ध्यान क्यों नहीं दिया.

छोटे-छोटे प्रयास से बड़े परिवर्तन संभव
पर्यावरण संरक्षण केवल बड़े संस्थाओं और चुनी हुई सरकारों की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है कि वह इस बारे में संवेदनशील बने. एक छोटा सा पौधा लगाना, पानी और ऊर्जा संसाधनों की बचत करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना और अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखना भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. जब लाखों लोग छोटे-छोटे प्रयास करते हैं, तभी बड़े परिवर्तन संभव होते हैं.

आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार
देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे प्रेरक उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां युवा, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर हरियाली बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने का सराहनीय कार्य कर रहे हैं. वृक्षारोपण अभियान, जल संरक्षण की पहल और जैव विविधता को बचाने के किये जा रहे प्रयास यह साबित करते हैं कि यदि कुछ अच्छा करने का संकल्प मजबूत हो तो प्रकृति का पुनर्जीवन संभव है. एक पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं होता, वह छाया देता है, वर्षा के लिये अनुकुल परिस्थिति पैदा करता है, पशु-पक्षियों को आश्रय देता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनता है.

भारतीय संस्कृति में प्रकृति सदैव पूजनीय
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है. प्राचीन काल से ही हमारे ऋषि-मुनियों ने वृक्षों, नदियों और पर्वतों को देवतुल्य सम्मान दिया था. हमारे शास्त्रों में पीपल, बरगद, तुलसी और नीम जैसे पेड़ केवल वनस्पति नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य के प्रतीक माने गए हैं. गंगा, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, क्षिप्रा और अन्य नदियों को माँ का दर्जा दिया गया है. यह परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व का भाव होना ही चाहिए.

पर्यावरण पर भाषण नहीं, जीवन शैली में बदलाव की जरुरत
आज के दौर में आवश्यकता केवल पर्यावरण पर भाषण देने की नहीं, बल्कि जीवन शैली में बदलाव लाने की है. आज जरूरत सस्टेनेबल डेवलपमेंट की अवधारणा पर ईमानदारी से काम करने की है. यदि हम आवश्यकता और लालच के बीच का अंतर समझ लें, तो पर्यावरण की अनेक समस्याएं अपने आप कम हो सकती हैं. टिकाऊ विकास का अर्थ यही है कि वर्तमान की जरूरतें पूरी करते हुए आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा की जाए. विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं और इनमें परस्पर संतुलन बनाए रखना ही इसका मूल मंत्र है.

पौधे लगाने का संकल्प ही न लें, बल्कि उन्हें वृक्ष बनाने का प्रण करें
विश्व पर्यावरण दिवस हम सबको आत्ममंथन का उचित अवसर देता है. यह दिन पूछता है कि क्या हम अपने बच्चों को हरे-भरे जंगल, स्वच्छ नदियाँ और नीला आकाश सौंप पाएंगे, या केवल प्रदूषण, जल संकट और जलवायु आपदाओं की विरासत छोड़ेंगे? इसका उत्तर हमारे आज के निर्णयों में छिपा है. आइए, इस मौके पर केवल पौधे लगाने का संकल्प ही न लें, बल्कि उन्हें वृक्ष बनाने का भी प्रण करें. केवल एक दिन पर्यावरण की चिंता न करें, बल्कि उसे अपने दैनिक व्यवहार का हिस्सा बनाएं, तभी हम बिगड़े हुए पर्यावरण को संभाल पाएंगे, क्योंकि प्रकृति की रक्षा करना किसी एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि जीवन भर चलने वाली जिम्मेदारी है.

आने वाली पीढ़ियाँ देंगी धन्यवाद
आज धरती हमें पुकार रही है. उसके घावों को भरने का सही समय अभी है या फिर कभी नहीं. यदि हम आज जाग गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें धन्यवाद देंगी, लेकिन यदि हमने इस पुकार को अनसुना किया, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा. विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि प्रकृति को बचाना दरअसल मानवता और मानवीय सभ्यता को बचाना है.

लेखक- मनोज सिंह बघेल
एडोटोरियल डायरेक्टर
NEWS 24 मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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