Dharm Desk- इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार ईद अल-अधा, जिसे बकरीद या कुर्बानी का पर्व भी कहा जाता है. इस साल 27 या 28 मई को मनाया जा सकता है. इसकी सटीक तारीख चांद दिखने पर निर्भर करती है. इस्लामी कैलेंडर के अनुसार यह पर्व ज़ुल हिज्जा की 10वीं तारीख को मनाया जाता हैं. माना जा रहा है कि 17 या 18 मई को चांद नजर आ सकता है. जिसके बाद बकरीद की तारीख तय हो जाएगी.

बकरीद, अल्लाह के प्रति समर्पण का प्रतीक है
बकरीद केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि इबादत, त्याग और अल्लाह के प्रति समर्पण का प्रतीक है. इस दिन मुसलमान पैगंबर इब्राहिम की कुर्बानी की भावना को याद करते है. जिन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपने सबसे प्रिय की बलि देने का संकल्प लिया था. इसी परंपरा के तहत मुसलमान भेड़, बकरी, ऊंट या भैंस की कुर्बानी देते है. उसके मांस को तीन हिस्सों में बांटते, एक परिवार, एक रिश्तेदारों और एक जरूरतमंदों के लिए दिया जाता है.
ज़ुल हिज्जा के 10 दिन और खास नियम
ज़ुल हिज्जा के पहले 10 दिन इस्लाम में बेहद मुकद्दस माने जाते है. इन दिनों में इबादत का सवाब कई गुना बढ़ जाता है. खास बात यह है कि जो लोग कुर्बानी करने का इरादा रखते है उनके लिए एक विशेष अमल बताया गया है, वे कुर्बानी होने तक अपने बाल और नाखून न काटें. यह परंपरा हजरत मोहम्मद की हदीसों पर आधारित है. हदीस में उल्लेख मिलता है कि ज़ुल हिज्जा का चांद दिखने के बाद, कुर्बानी करने वाला व्यक्ति बाल और नाखून काटने से परहेज करे.
आध्यात्मिक संदेश और महत्व
उलेमा बताते हैं कि यह अमल हज पर जाने वाले हाजियों की तरह सादगी और परहेज़गारी अपनाने का प्रतीक भी है. यह इंसान को सब्र, अनुशासन और अल्लाह के करीब होने का एहसास कराता है. साथ ही यह भी संदेश देता है कि कुर्बानी केवल जानवर की नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और अहंकार की भी होनी चाहिए, हालांकि, यह नियम अनिवार्य नहीं बल्कि मुस्तहब माना गया है. यदि कोई व्यक्ति अनजाने में बाल या नाखून काट लेता है, तो उसकी कुर्बानी पर कोई असर नहीं पड़ता. ज़ुल हिज्जा के ये दिन इबादत के साथ आत्मसंयम और इंसानियत की भावना को मजबूत करने का अवसर देते है.
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