Bastar News Update : दंतेवाड़ा. मलगिर क्षेत्र के बड़ेपल्ली, लावा और बैंगपाल गांवों में आजादी के बाद पहली बार स्कूल शुरू होने जा रहे हैं. इन गांवों के 65 बच्चे पहली बार औपचारिक शिक्षा से जुड़ेंगे. इलाका अब तक सड़क और शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित रहा है. शिक्षा विभाग की टीम ने गर्मी की छुट्टियों में दुर्गम रास्तों पर पैदल पहुंचकर सर्वे किया. घर-घर जाकर बच्चों की पहचान और दस्तावेज तैयार किए गए. अभिभावकों को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक किया गया. फिलहाल ग्रामीणों द्वारा उपलब्ध कराए गए भवनों में कक्षाएं संचालित होंगी. भविष्य में स्थायी स्कूल भवन बनाने की योजना तैयार की जा रही है. यह पहल दूरस्थ इलाकों में शिक्षा पहुंचाने की बड़ी कोशिश मानी जा रही है. साथ ही स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा पढ़ाई से जोड़ने का अभियान भी जारी है. पलायन और अन्य कारणों से शिक्षा से दूर हुए बच्चों की सूची तैयार की जा रही है. बस्तर के इन गांवों में अब पहली बार बच्चों के हाथों में कलम और किताब दिखाई देगी.
मानसून से पहले बाजार पहुंचा बोड़ा
जगदलपुर. बस्तर में मानसून की दस्तक के साथ जंगलों की एक दुर्लभ सौगात बाजारों तक पहुंचने लगी है. साल वनों में उगने वाला बोड़ा इस बार मौसम के बदलाव के कारण समय से पहले बाजार पहुंच गया. कीमत इतनी कि एक किलो बोड़ा खरीदने में हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. इसके बावजूद संजय बाजार में खरीदारों की भीड़ उमड़ पड़ी. बोड़ा केवल जून-जुलाई के सीमित दिनों में ही मिलता है, इसलिए इसकी मांग हमेशा अधिक रहती है. आदिवासी महिलाएं सुबह-सुबह जोखिम भरे जंगलों में जाकर इसका संग्रहण करती हैं. जहरीले सांपों और जंगली जानवरों के बीच यह काम आसान नहीं होता. कम उपलब्धता और विशेष स्वाद ने इसे बस्तर की पहचान बना दिया है..स्थानीय लोगों के साथ अब शहरों के लोग भी इसके दीवाने बन रहे हैं. बारिश के बाद बढ़ी उमस में साल वृक्षों के नीचे उगने वाला यह फंगस हर साल चर्चा में रहता है..बाजार में सीमित मात्रा पहुंचते ही कुछ ही घंटों में इसकी बिक्री हो जाती है. बोड़ा अब सिर्फ सब्जी नहीं, बल्कि बस्तर की मौसमी विरासत का प्रतीक बन चुका है.
इन्द्रावती नदी के कई एनीकटों के गेट अब भी बंद
मानसून के आगमन से पहले एनीकटों के गेट खोलने की प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं हो सकी है. इन्द्रावती नदी के कई एनीकटों में अभी भी गेट बंद पड़े हैं. नियमों के मुताबिक बरसात से पहले पानी निकासी सुनिश्चित करने के लिए इन्हें खोला जाना चाहिए. यदि भारी बारिश शुरू हो गई तो गेट खोलना और मुश्किल हो जाएगा. गेट बंद रहने से रेत और मिट्टी का जमाव बढ़ने का खतरा बना रहता है. कई एनीकटों में पहले से ही गाद भरने की समस्या सामने आ चुकी है. नारायणपाल एनीकट में तकनीकी खामियों के कारण स्थिति और गंभीर बताई जा रही है. मरम्मत कार्य भी समय पर नहीं होने से सवाल खड़े हो रहे हैं. किसानों की सिंचाई जरूरतों के लिए बनाए गए ये ढांचे अब रखरखाव की कमी झेल रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो जल निकासी प्रभावित हो सकती है. बारिश के दौरान दबाव बढ़ने पर संरचनात्मक नुकसान की आशंका भी बनी रहती है. अब निगाहें संबंधित विभाग पर हैं कि मानसून से पहले क्या जरूरी कदम उठाए जाते हैं.

करोड़ों की परियोजना, लेकिन रफ्तार पर सवाल; ओवरब्रिज निर्माण पर सख्ती
जगदलपुर. जगदलपुर-सुकमा मार्ग पर बन रहा रेलवे ओवरब्रिज अब निर्माण की धीमी गति को लेकर चर्चा में है. करीब 69 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना की प्रगति अपेक्षा से काफी पीछे बताई जा रही है..निरीक्षण के दौरान निर्माण कार्य की सुस्त रफ्तार पर गंभीर नाराजगी जताई गई. निर्माण एजेंसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है. विभाग का कहना है कि पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद कार्य लक्ष्य के अनुरूप नहीं बढ़ा. मैनपावर और मशीनरी की कमी को प्रमुख कारण माना गया है. बार-बार निर्देशों के बाद भी सुधार नहीं होने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है. परियोजना राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे यातायात दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है.स्थानीय लोगों को लंबे समय से इसके पूरा होने का इंतजार है. समय सीमा में काम पूरा कराने के लिए दबाव बढ़ाया गया है. विभाग ने निर्माण एजेंसी को अतिरिक्त संसाधन जुटाने के निर्देश दिए हैं. अब देखना होगा कि नोटिस के बाद काम की रफ्तार में कितना बदलाव आता है.
खुले में फेंक दी गई एक्सपायरी दवाईयां
दंतेवाड़ा. गीदम के साप्ताहिक बाजार में खुले में पड़ी एक्सपायरी दवाओं ने गंभीर चिंता खड़ी कर दी है. जहां रोजाना हजारों ग्रामीण और बच्चे पहुंचते हैं, वहीं दवाओं का इस तरह पड़ा होना जोखिम बढ़ा रहा है. रंगीन पैकिंग वाली दवाएं बच्चों को आकर्षित कर सकती हैं. अनजाने में सेवन होने पर बड़ा हादसा होने की आशंका जताई जा रही है. नियमों के अनुसार एक्सपायरी दवाओं का वैज्ञानिक तरीके से निपटान किया जाना चाहिए. खुले स्थान पर फेंकना जैव चिकित्सा अपशिष्ट नियमों के उल्लंघन के दायरे में आता है. स्थानीय लोगों ने तत्काल कार्रवाई की मांग उठाई है. बाजार क्षेत्र में लोगों को सतर्क करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है. मामले की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग भी तेज हो रही है. जनस्वास्थ्य से जुड़ा यह मुद्दा प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी लापरवाही भविष्य में गंभीर परिणाम दे सकती है. अब निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई और दवा निपटान प्रक्रिया पर टिकी हैं.
टेलिंग डैम क्षेत्र से हटाए गए परिवारों की नई चुनौती
दंतेवाड़ा. बैलाडिला के टेलिंग डैम क्षेत्र से 10 परिवारों को सुरक्षा कारणों का हवाला देकर हटाया गया. प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को अस्थायी भवनों में ठहराने की व्यवस्था की है. कार्रवाई के दौरान सामान शिफ्ट करने के लिए वाहन और मजदूर भी उपलब्ध कराए गए. हालांकि प्रभावित परिवारों का कहना है कि अस्थायी आश्रय स्थायी समाधान नहीं है. वे जमीन और स्थायी पुनर्वास की मांग पर अड़े हुए हैं. प्रशासन का दावा है कि क्षेत्र तकनीकी रूप से संवेदनशील और जोखिमपूर्ण है. वहीं लोगों का सवाल है कि यदि खतरा था तो वर्षों तक बसने की अनुमति क्यों रही. कार्रवाई के दौरान जनप्रतिनिधियों ने भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की मांग उठाई. विस्थापित परिवारों के सामने आजीविका और भविष्य की चिंता सबसे बड़ी है. सुरक्षा के नाम पर हुई कार्रवाई अब पुनर्वास बहस का केंद्र बन गई है. प्रभावित लोगों को फिलहाल मुआवजा प्रक्रिया का भरोसा दिया गया है. यह मामला आने वाले दिनों में प्रशासन और जनहित के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा बन सकता है.
नए शिक्षा सत्र से पहले नई परेशानी
जगदलपुर. 16 जून से नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ लाखों पाठ्य पुस्तकें विद्यार्थियों तक पहुंचाई जानी हैं. इस बार हर किताब वितरण से पहले क्यूआर कोड स्कैन करना अनिवार्य किया गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर नेटवर्क और बिजली कटौती शिक्षकों की चिंता बढ़ा रही है. कई जगह मोबाइल सिग्नल तक उपलब्ध नहीं हैं. शिक्षकों को आशंका है कि स्कैनिंग प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है. इससे शुरुआती दिनों की पढ़ाई भी प्रभावित होने का डर है. विभाग का दावा है कि किताबें और गणवेश पहले ही स्कूलों तक पहुंचा दिए गए हैं. शाला प्रवेश उत्सव के साथ विद्यार्थियों का स्वागत किया जाएगा. खेलकूद और सांस्कृतिक.गतिविधियों के जरिए बच्चों को.स्कूल से जोड़ने की तैयारी है. दूसरी ओर कई स्कूल भवन जर्जर होने से वैकल्पिक स्थानों पर कक्षाएं लगाने की नौबत है. कहीं पंचायत भवन तो कहीं आंगनबाड़ी केंद्र शिक्षा का अस्थायी केंद्र बनेंगे. नए सत्र की शुरुआत उत्साह के साथ हो रही है, लेकिन जमीनी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं.
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