जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक मामले को लेकर हुए आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में रुचिका सिंह के खिलाफ दर्ज जीरो FIR का मामला अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनता जा रहा है। इस मामले में अब सौरव दास (Saurabh Das) खुलकर रुचिका सिंह (Ruchika Singh) के समर्थन में सामने आए हैं। सौरव दास ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि 25 वर्षीय एक युवती के खिलाफ आपराधिक कानूनों का इस्तेमाल करना पूरी तरह अस्वीकार्य है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार है तथा ऐसे मामलों में कठोर कानूनी कार्रवाई चिंताजनक है।

रुचिका सिंह के खिलाफ दर्ज जीरो एफआईआर को लेकर विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। समर्थकों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए, जबकि दूसरी ओर शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि आंदोलन के दौरान की गई टिप्पणी आपत्तिजनक थी और उस पर कार्रवाई जरूरी है।

सौरव दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि रुचिका सिंह के खिलाफ आपराधिक कानूनों का इस्तेमाल पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने लिखा कि अभद्र भाषा या अपशब्दों का प्रयोग अपने आप में किसी आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बनता। लोकसभा के लगभग 50 % सांसदों पर विभिन्न आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें करीब 100 सांसद भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े हैं। सौरव दास ने तर्क दिया कि पुलिस को अपनी ऊर्जा ऐसे मामलों की जांच और कार्रवाई में लगानी चाहिए, न कि 25 वर्षीय एक युवती के खिलाफ कार्रवाई करने में। सौरव दास ने युवाओं के कथित उत्पीड़न पर भी चिंता जताई और कहा कि इस तरह की कार्रवाई तत्काल बंद होनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस और तेज हो गई है।

जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद

रुचिका सिंह के खिलाफ दर्ज जीरो एफआईआर का मामला 23 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़ा है। उस दिन NEET पेपर लीक के विरोध में बड़ी संख्या में छात्र और युवा प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान रुचिका सिंह नाम की एक युवती का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसने बाद में विवाद का रूप ले लिया। वायरल वीडियो में रुचिका सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से आपत्तिजनक और अभद्र टिप्पणी करती हुई दिखाई दीं। वीडियो तेजी से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फैल गया, जिसके बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग उठने लगी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा के प्रतिकूल है। शिकायत में यह भी कहा गया कि ऐसी टिप्पणियां समाज में वैमनस्य फैलाने और सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था को प्रभावित करने की आशंका पैदा कर सकती हैं।

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जंतर-मंतर पर हुए NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में रुचिका सिंह के खिलाफ 29 जुलाई 2026 को गौतमबुद्ध नगर के एक्सप्रेसवे थाने में जीरो एफआईआर दर्ज की गई। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया शुरू की। पुलिस के अनुसार, रुचिका सिंह के खिलाफ BNS की धारा 352, 353(1) और 356(1) के तहत केस दर्ज किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से आपत्तिजनक और अभद्र टिप्पणी की गई थी, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

FIR में क्या हैं आरोप?

रुचिका सिंह के खिलाफ दर्ज जीरो एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। शिकायतकर्ता का कहना है कि इस तरह की टिप्पणी देश के प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली है। एफआईआर के अनुसार, सार्वजनिक मंच से की गई ऐसी टिप्पणियां लोगों के बीच दुर्भावना और तनाव का माहौल पैदा कर सकती हैं। शिकायत में यह भी आशंका जताई गई है कि इस प्रकार के बयान कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं और सामाजिक सौहार्द पर भी असर डाल सकते हैं। इन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

FIR पर छिड़ी नई बहस

जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर रुचिका सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर अब केवल कानूनी मामला नहीं रह गया है। यह विवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक विरोध की सीमाओं और कानून के इस्तेमाल को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बनता जा रहा है। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब सौरव दास ने सार्वजनिक रूप से रुचिका सिंह का समर्थन करते हुए पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उनकी टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष में बहस तेज हो गई है।

एक पक्ष का मानना है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद के खिलाफ कथित रूप से अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है और ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई आवश्यक है। उनका तर्क है कि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना जरूरी है।

वहीं, दूसरा पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के अनुपातिक इस्तेमाल से जुड़ा मुद्दा बता रहा है। इस पक्ष का कहना है कि राजनीतिक असहमति और विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं तथा ऐसे मामलों में आपराधिक कानूनों के प्रयोग पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

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