अमित पाण्डेय, खैरागढ़। एक तरफ़ खैरागढ़ जिले में यातायात के नाम पर बसों का ही सहारा है तो वहीं दूसरी ओर बस के किराए में बढ़ोतरी से आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ गया है। इधर पिछले आठ साल से रेल लाइन का इंतजार भी जारी है, कटघोरा-डोंगरगढ़ रेल परियोजना को लेकर एक बार फिर सरकार की कैबिनेट से मंजूरी की खबर आई है। नेता बधाई दे रहे हैं, प्रयास गिना रहे हैं और जल्द काम आगे बढ़ने की बात कह रहे हैं, लेकिन खैरागढ़ के लोगों के मन में एक ही सवाल है, आखिर रेल लाइन जमीन पर कब उतरेगी?
शहर की यातायात व्यवस्था और बढ़ते सफर के खर्च के बीच अब लोगों को घोषणाओं से ज्यादा काम शुरू होने का इंतजार है। खैरागढ़ से राजनांदगांव, डोंगरगढ़, कवर्धा और दूसरे शहरों तक आने-जाने के लिए लोगों को बसों पर निर्भर रहना पड़ता है। स्थानीय निवासी राजेंद्र चंदेल का कहना है कि खैरागढ़ की पहचान देश-विदेश तक है। यहां संगीत विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए विदेशी विद्यार्थी भी आते हैं, लेकिन यातायात के मामले में क्षेत्र के लोगों के पास सीमित विकल्प हैं।

चंदेल के मुताबिक, जिन रास्तों पर पहले करीब 100 रुपये किराया लगता था, वहां अब 140 से 150 रुपये तक देने पड़ रहे हैं। उनका कहना है कि लगातार बढ़ते खर्च के बीच बस किराए में बढ़ोतरी ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। रोज कमाने-खाने वाले, नौकरीपेशा लोगों और विद्यार्थियों के लिए सफर करना पहले से महंगा हो गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब खैरागढ़ को बेहतर यातायात सुविधा की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है, तो रेल परियोजना अब तक निर्माण के स्तर तक क्यों नहीं पहुंच पाई?
करीब 295 किलोमीटर लंबी कटघोरा-तखतपुर-मुंगेली-कवर्धा-खैरागढ़-डोंगरगढ़ रेल परियोजना को वर्ष 2018 में मंजूरी मिली थी। अब छत्तीसगढ़ सरकार की कैबिनेट ने परियोजना के लिए छत्तीसगढ़ रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड के माध्यम से इक्विटी निवेश के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इससे परियोजना को आगे बढ़ाने की उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन खैरागढ़ के लोगों के लिए असली खबर तब होगी, जब जमीन पर काम शुरू होगा और रेल लाइन का निर्माण दिखाई देने लगेगा।

आठ साल के इंतजार के बाद एक बार फिर उम्मीद जगी है, लेकिन लोगों के मन में यह सवाल भी है कि क्या इस बार घोषणा से आगे बढ़कर काम शुरू हो पाएगा? भाजपा सांसद प्रतिनिधि भागवत शरण सिंह का कहना है कि कांग्रेस को इस मुद्दे पर सवाल उठाने से पहले अपने लंबे शासनकाल का हिसाब देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसद संतोष पाण्डेय लगातार रेल लाइन के लिए प्रयास कर रहे हैं और केंद्र तथा राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण सहित शुरुआती प्रक्रियाओं के लिए राशि जारी की है।
उनके मुताबिक, विकास कार्य एक तय प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। यानी भाजपा की ओर से परियोजना को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ने का दावा किया जा रहा है। लेकिन अब लोगों की नजर इस बात पर है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया कहां तक पहुंची है और निर्माण शुरू करने की तारीख कब सामने आएगी।

दूसरी तरफ कांग्रेस विधायक प्रतिनिधि मनराखन देवांगन ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि रेल लाइन के नाम पर बार-बार भूमि पूजन, घोषणाएं और बधाइयां दी जाती हैं, लेकिन खैरागढ़ में अब तक काम दिखाई नहीं दे रहा। उन्होंने बस किराए में कथित 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और रोजमर्रा की जरूरतों की महंगाई के बीच आम आदमी पहले ही परेशान है। अब बसों का किराया बढ़ने से उसकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
देवांगन ने सरकार से महंगाई पर नियंत्रण और रेल परियोजना को लेकर ठोस कदम उठाने की मांग की। रेल लाइन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। भाजपा की ओर से राशि जारी होने और प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात कही जा रही है, जबकि कांग्रेस निर्माण शुरू नहीं होने पर सवाल उठा रही है। लेकिन इस राजनीतिक बहस के बीच खैरागढ़ की जनता की परेशानी अपनी जगह कायम है। लोगों को रोजाना सफर के लिए बसों पर निर्भर रहना पड़ रहा है और किराए में बढ़ोतरी का असर उनकी जेब पर पड़ रहा है।

रेल लाइन बनने से क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी मिलने और यात्रियों को एक वैकल्पिक साधन उपलब्ध होने की उम्मीद है।खैरागढ़ के लोगों ने इस रेल परियोजना के लिए लंबा इंतजार किया है। अब सवाल यह नहीं कि किस नेता ने कितनी बार प्रयास किया, किसने बधाई दी या किसने नारियल फोड़ा।
सवाल यह है कि भूमि अधिग्रहण और निर्माण की वास्तविक स्थिति क्या है, काम शुरू होने की समयसीमा क्या तय हुई है और खैरागढ़ को रेल सुविधा के लिए अभी कितना इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि जनता के लिए रेल लाइन का मतलब सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि ऐसा विकल्प है जो सफर का खर्च कम करने और क्षेत्र की कनेक्टिविटी बेहतर बनाने में मदद कर सके। अब देखना होगा कि कैबिनेट की ताजा मंजूरी के बाद रेल परियोजना वाकई रफ्तार पकड़ती है या खैरागढ़ के लोगों को एक बार फिर अगली घोषणा का इंतजार करना पड़ता है।
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