कुंदन कुमार/पटना। बिहार की राजनीति और प्रशासनिक गलियारे में इस समय बड़े बदलावों की लहर देखी जा रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने न केवल सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है, बल्कि राज्य की सियासत में ‘सुप्रीमेसी’ की जंग को भी हवा दे दी है। नगर विकास विभाग द्वारा जारी उस विवादित आदेश को रद्द कर दिया गया है, जिसमें कर्मचारियों के लिए सेवाकाल में केवल एक बार परीक्षा देने की बाध्यता थी।

क्या था विवादित आदेश और क्यों मचा था बवाल?
बीते 6 अप्रैल को नगर विकास विभाग ने एक आदेश जारी किया था, जिसके अनुसार सरकारी कर्मचारी अपने पूरे सेवाकाल में केवल एक बार ही विभागीय या प्रतियोगी परीक्षा में बैठ सकते थे। इस आदेश में यहां तक चेतावनी दी गई थी कि नियम का उल्लंघन करने पर कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। इस फैसले के समय विभाग की कमान विजय सिन्हा के पास थी। इस आदेश के बाद राज्य भर के कर्मचारी संगठनों ने मोर्चा खोल दिया था, क्योंकि इसे करियर ग्रोथ में एक बड़ी बाधा माना जा रहा था।
सम्राट चौधरी का हस्तक्षेप
मामले की गंभीरता और कर्मचारियों के आक्रोश को देखते हुए, सम्राट चौधरी ने इस सख्त प्रावधान को निरस्त करने का निर्देश दिया। अब नगर विकास विभाग ने आधिकारिक पत्र जारी कर पुराने आदेश को वापस ले लिया है। इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि अब कर्मचारी अपनी योग्यता बढ़ाने और पदोन्नति के लिए नौकरी के दौरान कई बार परीक्षाओं में सम्मिलित हो सकेंगे। इस निर्णय से कर्मचारी वर्ग में भारी उत्साह और खुशी का माहौल है।
राजस्व विभाग में भी नरमी के संकेत
सिर्फ नगर विकास ही नहीं, बल्कि राजस्व विभाग में भी नरमी देखी जा रही है। राजद प्रवक्ता एजाज अहमद के अनुसार, अंचल अधिकारियों और राजस्व कर्मचारियों पर की गई सख्ती को भी कम किया गया है। हड़ताल पर गए कर्मचारियों की मांगों और विभागीय कार्यप्रणाली को देखते हुए आदेशों में बदलाव किए गए हैं, ताकि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से चल सकें।
विपक्ष का हमला: ‘सुप्रीमेसी’ की जंग या जनहित?
इस प्रशासनिक फेरबदल पर राजद ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्रवक्ता एजाज अहमद ने आरोप लगाया है कि सम्राट चौधरी अपने ही सहयोगियों और पूर्व के फैसलों को पलटकर अपनी ‘सुप्रीमेसी’ दिखाना चाहते हैं। विपक्ष का कहना है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए जो सख्ती बरती गई थी, उसे ढीला करके सरकार जनता के हितों के साथ समझौता कर रही है। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि इन फैसलों से जनता का भला होगा या प्रशासनिक पकड़ ढीली होगी।
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