पटना। बिहार सरकार द्वारा हाल ही में मंजूर की गई बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026′ ने सूबे की सियासत गरमा दी है। राज्य कैबिनेट के इस फैसले का विरोध करते हुए राजद नेता और पूर्व कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने इसे गरीबों की जेब पर डाका करार दिया है। उन्होंने सरकार से इस फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की है।
ग्रामीण जनता पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
सुधाकर सिंह ने प्रेस वार्ता में कहा कि 15 जुलाई 2026 को कैबिनेट ने बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 के तहत पंचायतों को कर, दर और शुल्क लगाने का कानूनी अधिकार दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ग्रामीण आबादी पहले से ही महंगाई और बेरोजगारी की मार झेल रही है, ऐसे में हाउस टैक्स, नल-जल टैक्स और पंजीकरण शुल्क जैसे कर उन पर अतिरिक्त बोझ साबित होंगे। इस मौके पर वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. संतोष मेहरोत्रा भी मौजूद रहे।
मेहनतकश और छोटे व्यवसायी होंगे प्रभावित
पूर्व मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस नियमावली का सबसे बुरा असर समाज के वंचित और मेहनतकश वर्ग पर पड़ेगा। बढ़ई, लोहार, कुम्हार, नाई, धोबी से लेकर छोटे सब्जी-फल विक्रेताओं तक, जिनकी आय पहले से ही सीमित है, उन पर कर का दबाव उनके पारंपरिक व्यवसाय को संकट में डाल देगा। सुधाकर सिंह के अनुसार, गांव की छोटी दुकानों जैसे चाय, किराना या मरम्मत की दुकानों की लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर ग्रामीण उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक दुष्प्रभाव
सुधाकर सिंह ने चेतावनी दी कि यह केवल एक टैक्स नहीं, बल्कि ग्रामीण बाजार के चक्र को बिगाड़ने वाली नीति है। छोटे व्यवसायियों की लागत बढ़ने से वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ेंगे, जिससे गांवों की क्रय शक्ति कम होगी और स्थानीय आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड़ सकती हैं। उन्होंने कहा कि इससे रोजगार के अवसर भी सीमित होंगे।
अनुदान का विकल्प अपनाने की सलाह
सरकार को सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि पंचायतों को सक्षम बनाने का अर्थ जनता से वसूली करना नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप पंचायतों को पर्याप्त अनुदान दे और केंद्रीय-राज्य योजनाओं की राशि समय पर जारी करे। उन्होंने जोर देकर कहा कि पंचायतों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर गरीबों का शोषण करना अनुचित है। सरकार को जनता के हितों को सर्वोपरि रखते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

