पटना। समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ताजा ऐलान के बाद बिहार के सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में बड़ी राजनीतिक हलचल पैदा हो गई है। भाजपा जहां 2029 से पहले इसे लागू करने के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है, वहीं सहयोगी दलों ने इस पर असहमति जताई है।

​2029 से पहले UCC लागू करने का संकल्प

​मुंबई में आयोजित ‘सेवा संकल्प अभियान’ के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा ऐलान किया कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और एनडीए शासित सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 44 से जोड़ते हुए ‘एक देश, एक कानून’ की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। शाह के मुताबिक इससे विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता आएगी। उत्तराखंड में इसके लागू होने के बाद, अब पार्टी इसे अन्य राज्यों में भी तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है।

​जेडीयू और LJPR का विरोध और असहज रुख

​अमित शाह के इस बयान के बाद बिहार में एनडीए के मुख्य सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड (JDU) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जेडीयू नेता श्याम रजक ने दो टूक कहा कि बिहार में UCC किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने दिया जाएगा। हालांकि पार्टी ने संसद में इस पर सैद्धांतिक रुख साफ किया था, लेकिन नीतीश कुमार का पुराना स्टैंड रहा है कि बिना व्यापक परामर्श के किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने भी इस मामले पर शीर्ष नेतृत्व के समक्ष पार्टी का पक्ष रखने की बात कही है।

​गठबंधन की स्थिरता और क्षेत्रीय स्वायत्तता का सवाल

​यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक वैचारिक नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय दलों की स्वायत्तता का भी परीक्षण बन गया है। भाजपा जहां अपने कोर वैचारिक मुद्दों को धार दे रही है, वहीं जेडीयू और एलजेपीआर अपने सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटे हैं। आने वाले दिनों में केंद्रीय नेतृत्व और क्षेत्रीय दलों के बीच होने वाली बैठकों से ही यह तय होगा कि बिहार में यह मुद्दा गठबंधन के भीतर क्या नया मोड़ लेता है।