Bikaner Freedom Fighters: देश आज 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आजादी के इस गौरवशाली सफर में इतिहास के कई ऐसे परिवार हैं, जिनकी कहानियां आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती हैं। बीकानेर के वैद्य मघाराम का परिवार भी ऐसी ही कहानी अपने भीतर समेटे हुए है।

परिवार के तीन सदस्यों ने अलग-अलग दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। वैद्य मघाराम ने आंदोलन को संगठित किया, उनकी बहन वीरांगना खेतू बाई ने दुधवा खारा किसान आंदोलन में योगदान दिया, जबकि उनके पुत्र रामनारायण शर्मा ने महज 15 साल की उम्र में तिरंगा फहराकर गिरफ्तारी दी।

दुधवा खारा आंदोलन में वैद्य मघाराम की अहम भूमिका

वैद्य मघाराम ने 1946 के दुधवा खारा आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने प्रजा परिषद के गठन के जरिए लोगों को संगठित किया और राजशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की। आंदोलन में सक्रिय भूमिका और मुखर विरोध के चलते उन्हें देश निकाला भी भुगतना पड़ा। हालांकि, इससे उनका संघर्ष रुका नहीं और उन्होंने आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना जारी रखा।

कोलकाता पहुंचकर भी जारी रखा आंदोलन

बीकानेर से दूर कोलकाता पहुंचने के बाद भी वैद्य मघाराम ने आंदोलन से अपना जुड़ाव बनाए रखा। वहां भी उन्होंने प्रजा परिषद के गठन और आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया। जगह और परिस्थितियां बदलती रहीं, लेकिन देश को आजाद देखने का उनका संकल्प कायम रहा।

वीरांगना खेतू बाई ने भी निभाई अहम भूमिका

वैद्य मघाराम की बहन वीरांगना खेतू बाई ने भी दुधवा खारा किसान आंदोलन में योगदान दिया। इस तरह परिवार के अलग-अलग सदस्यों ने अपने-अपने स्तर पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में भागीदारी निभाई।

15 साल की उम्र में तिरंगा फहराकर दी गिरफ्तारी

वैद्य मघाराम के पुत्र रामनारायण शर्मा ने महज 15 साल की उम्र में बीकानेर में तिरंगा फहराकर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। उस दौर में तिरंगा फहराना अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विरोध का बड़ा प्रतीक था।

तिरंगा फहराने के बाद रामनारायण शर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया। जिस उम्र में बच्चे अपने भविष्य के सपने देखते हैं, उस उम्र में उन्होंने देश की आजादी के लिए जेल जाना स्वीकार किया।

वैद्य मघाराम, खेतू बाई और रामनारायण शर्मा की यह कहानी बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन में केवल एक पीढ़ी नहीं, बल्कि एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों ने अपने स्तर पर संघर्ष किया। आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऐसे परिवारों के योगदान को याद करना उस इतिहास को सम्मान देना है, जिसने देश की आजादी की नींव मजबूत की।

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