वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। बिलासपुर के फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले में आए दिन बड़े खुलासे हो रहे हैं। पुलिस जांच में अब संगठित नेटवर्क, फर्जी दस्तावेज, बैंक खातों और सरकारी विभागों की मिलीभगत के संकेत मिले हैं। इस मामले में अब तक सिम्स में पदस्थ रहीं डॉ. प्रियंका सोनी समेत एसडीएम और तहसीलदार कार्यालय के 3 क्लर्क समेत 17 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं मामले में लिपिक संघ ने कहा कि अधिकारियों को छोड़ केवल छोटे कर्मचारियों को आरोपी बनाया जा रहा है।

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मास्टरमाइंड समेत कई आरोपी जेल में बंद

सर्पदंश मामले में सरकंडा पुलिस ने मास्टरमाइंड हीराप्रसाद खांडेकर समेत तीन आरोपियों को कोर्ट की अनुमति से एक दिन की पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की। पूछताछ के दौरान पुलिस ने हैंडराइटिंग के नमूने और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य जुटाए, जिसके बाद तीनों को फिर से जेल भेज दिया गया।

वहीं एक अन्य मामले में हितग्राही महिला शिवकुमारी साहू और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के आरोप में फोटो कॉपी दुकान संचालक आकाश साहू को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जांच में सामने आया है कि अशोकनगर स्थित एक फोटो कॉपी दुकान में फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे, जबकि तहसील संबंधी काम कथित रूप से तहसीलदार का ड्राइवर करवाता था।

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7 वर्तमान व पूर्व तहसीलदारों को पुलिस का नोटिस

जांच के दौरान सरकंडा पुलिस ने सर्पदंश मुआवजा वितरण से जुड़े मामले में 7 वर्तमान और पूर्व तहसीलदारों को बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस भेजा है। पुलिस ने यह नोटिस व्हाट्सएप के माध्यम से भेजा है और उन्हें जांच में सहयोग करने के लिए उपस्थित होने को कहा गया है। हालांकि, नोटिस जारी होने के बावजूद अब तक कोई भी तहसीलदार बयान देने नहीं पहुंचा है। पुलिस अब इस मामले में अगले कदम की तैयारी कर रही है। अधिकारियों से पूछताछ होने पर कई बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

सामान्य मौतों को बनाया गया स्नेक बाइट

पुलिस के अनुसार, सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज तैयार किए जाते थे, जिनके आधार पर चार-चार लाख रुपये का सरकारी मुआवजा हासिल किया जाता था। अब तक की जांच में 431 मामलों में करीब 17.24 करोड़ रुपये के फर्जी भुगतान की बात सामने आई है।

गिरोह ने 10 से अधिक बैंकों में फर्जी खाते खुलवाए, जिनमें सबसे अधिक खाते आईडीबीआई बैंक की दयालबंद शाखा में खोले गए। पुलिस बैंक खातों की केवाईसी, स्टेटमेंट और संदिग्ध लेनदेन की जांच कर रही है।

अस्पताल में मौत की सूचना मिलते ही सक्रिय हो जाता था गिरोह

मामले की जांच में खुलासा हुआ है कि अस्पताल में मौत की सूचना मिलते ही गिरोह सक्रिय हो जाता था। परिजनों को मुआवजे का लालच देकर सामान्य मौत को सर्पदंश बताने के लिए तैयार किया जाता था। इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के जरिए सरकारी राशि निकालकर आपस में बांट ली जाती थी। इस गिरोह में अधिवक्ता, पुलिस, राजस्व, बैंक और स्वास्थ्य विभाग के लोग शामिल बताए जा रहे हैं।

बड़े अधिकारियों को बचाने के आरोप

आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद अब केवल छोटे कर्मचारियों को दोषी बनाकर आला अफसरों को बचाने के आरोप भी लग रहे हैं। इसको लेकर लिपिक संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी ने डीजीपी से कर्मचारियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाने और पूछताछ में पूरा सहयोग देने की बात कही है।

जिले के आला अफसरों का कहना है कि जांच अभी जारी है और इस पूरे नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। जो भी इसमें शामिल होगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा।

विधानसभा में उठा था मामला

इस घोटाले की गूंज विधानसभा में उठी थी। जानकारी के अनुसार, जशपुर जिले में पिछले तीन वर्षों में सर्पदंश से केवल 96 मौतें दर्ज हुईं, जबकि अकेले बिलासपुर में 431 मौतें बताकर 17.24 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया। बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए यह मुद्दा विधानसभा में उठाया था। मामले में काफी हंगामे के बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही थी।

फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाकर किया गया खेल

साल 2025 में बिल्हा थाना क्षेत्र में जहर खाने से हुई एक मौत को स्नेक बाइट बताकर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने का पहला मामला सामने आया था। उस मामले में भी डॉ. प्रियंका सोनी, मृतक के परिजन और एक वकील को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। इसके बाद मामले में एसडीएम कार्यालय के बाबू नरेंद्र कौशिक, गरीब राम बिंझवार और तहसीलदार कार्यालय के क्लर्क हरिशंकर राठौर भी शामिल पाए गए हैं। पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

4 लाख के मुआवजे का किया गया दुरुपयोग

शासन के नियमों के अनुसार, सांप काटने पर 4 लाख रुपये मुआवजे का प्रावधान है। यही वजह है कि सरकारी मुआवजा हासिल करने लोगों ने अपने परिजनों की सामान्य मौत को सर्पदंश बताकर सरकार से लाखों रुपये मुआवजा ले लिए। महमंद निवासी निसार खान और लता सूर्यवंशी की संदिग्ध मौत के मामलों को स्नेक बाइट का मामला बनाया गया था। इस मामले में दो मृतकों के रिश्तेदार और एक वकील समेत तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।

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