Lalluram Desk. सावन में सुहागिनों और कुंवारी कन्याओं का सबसे प्रिय पर्व ‘हरियाली तीज’ होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यही वह पावन दिन है, जब माता पार्वती की सैकड़ों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था।

आप भी अपने दाम्पत्य जीवन में प्यार बढ़ाना चाहती हैं, या मनचाहा जीवनसाथी पाना चाहती हैं तो इस हरियाली तीज पर भगवान शंकर और माता पार्वती की खास पूजा-अर्चना जरूर करें। सही विधि से की गई पूजा से भोलेनाथ बहुत जल्दी खुश होते हैं।

प्रातः काल में उठकर संकल्प लें

    हरियाली तीज के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान ध्यान करें। इस दिन हरे रंग का बहुत खास महत्व होता है। इसलिए इस दिन हरे रंग के साफ या नए कपड़े पहनें। हाथों में रची मेहंदी और 16 सिंगार इस त्योहार की सुंदरता को और बढ़ा देते है । इसके बाद पूजा घर की साफ-सफाई करके उपवास का संकल्प लें।

    मिट्टी के शिव-पार्वती की स्थापना

      पूजा के लिए बाजार से लाई मूर्ति की जगह यदि आप अपने हाथों से काली मिट्टी या बालू से शंकरजी, देवी पार्वती के साथ श्री गणेश की छोटी-छोटी मूर्तियां बनाती है तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर इन मूर्तियों को स्थापित करें और गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।

      भोलेनाथ की प्रिय चीजें अर्पित करें

        भगवान भोलेनाथ बहुत भोले हैं उन्हें खुश करने के लिए भारी-भरकम चीजों की आवश्यकता नहीं होती। पूजा के दौरान शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध, दही, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के पत्ते और आंकड़े के फूल जरूर चढ़ाएं। ध्यान रहे कि बेलपत्र कहीं से कटा-फटा नहीं होना चाहिए।

        देवी पार्वती को चढ़ाएं सुहाग का सामान

          हरियाली तीज का व्रत सुहाग की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। इसलिए देवी पार्वती को लाल चुनरी और 16 श्रृंगार का सामान जरूर चढ़ाएं कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए माता से प्रार्थना करते हुए सिंदूर का तिलक लगाएं।

          कथा का पाठ और आरती

          देवी पार्वती को सभी सामग्रियां चढ़ने के बाद हरियाली तीज की व्रत कथा ध्यानपूर्वक सुनें या पढ़ें। कथा के बिना इस व्रत का फल पूरा नहीं माना जाता है । कथा समाप्त होने के बाद धूप-दीप जलाकर भगवान शंकर और देवी पार्वती की आरती उतारें।

          भोग लगाकर बांटें प्रसाद

          पूजा के अंत में भगवान को घेवर मालपुआ या घर में बनी खीर का भोग लगाएं। इसके बाद परिवार के बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आर्शीवाद लें और फिर प्रसाद को सभी में बांट दें।

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