दिल्ली में शिक्षा विभाग के तहत कार्यरत 142 अतिथि शिक्षकों पर बड़ी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। इन शिक्षकों पर जनगणना कार्य में लगाए जाने के बावजूद अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने से इनकार करने का आरोप है। प्रशासन ने इस मामले को गंभीर मानते हुए इसे “घोर लापरवाही और अनुशासनहीनता” करार दिया है। अधिकारियों के अनुसार, संबंधित शिक्षकों को जनगणना कार्य के लिए नियुक्त किया गया था, लेकिन उन्होंने इसे करने से कथित रूप से इनकार कर दिया। सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में विभागीय जांच की प्रक्रिया शुरू हो सकती है और दोषी पाए जाने पर इन शिक्षकों को बर्खास्तगी जैसी सख्त कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। शिक्षा विभाग का कहना है कि सरकारी कार्यों में लगाए जाने वाले कर्मियों से अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित दायित्वों का पालन करें, और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

शिक्षा निदेशक को 24 अप्रैल को लिखे एक पत्र में पुरानी दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट ने इस पूरे मामले पर गंभीर आपत्ति जताई है। पत्र में कहा गया है कि 16 अप्रैल को जारी पहले निर्देश के बावजूद शिक्षकों ने सौंपे गए जनगणना कार्य को करने से इनकार किया। जिला प्रशासन के अनुसार, उन्हें इस कार्य में भाग न लेने से उत्पन्न कठिनाइयों के बारे में पहले ही अवगत कराया गया था, इसके बावजूद उन्होंने सहयोग नहीं किया। प्रशासन ने इस इनकार को “घोर लापरवाही, कर्तव्य की अवहेलना और जनहित के लिए हानिकारक” बताया है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुल 142 अतिथि शिक्षकों ने जनगणना से संबंधित वैधानिक दायित्व निभाने से इनकार किया।

पुरानी दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट ने शिक्षा निदेशक को लिखे पत्र में 142 अतिथि शिक्षकों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से बंद या समाप्त करने का अनुरोध किया है। पत्र में कहा गया है कि इन शिक्षकों ने सौंपे गए जनगणना कार्य को करने से इनकार किया, जबकि पहले जारी निर्देशों में उन्हें स्पष्ट रूप से इस दायित्व के बारे में बताया गया था। प्रशासन ने इस व्यवहार को अनुशासनहीनता और कर्तव्य से विमुखता माना है। जिला मजिस्ट्रेट ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि इस तरह के कृत्यों को बर्दाश्त करने से जनगणना कार्य में लगे अन्य कर्मचारियों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और पूरी प्रक्रिया की कार्यकुशलता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस प्रकार की गैर-अनुपालन की प्रवृत्ति को अनुमति दी जाती है, तो यह न केवल जनगणना प्रक्रिया को बाधित कर सकता है, बल्कि समान वैधानिक जिम्मेदारी निभाने वाले अन्य कर्मियों के बीच अनुशासन को भी कमजोर कर सकता है।

दिल्ली के सरकारी शिक्षक संघ ने शिक्षा मंत्री आशीष सूद से इस कार्रवाई को वापस लेने की अपील की है। संघ के महासचिव अजय वीर ने मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि सभी संबंधित अतिथि शिक्षक वार्षिक अनुबंध पर कार्यरत हैं, जो आगामी 8 मई को समाप्त होने वाला है। उन्होंने तर्क दिया कि जनगणना ड्यूटी से इनकार को जानबूझकर की गई अवज्ञा नहीं माना जाना चाहिए। जीटीए के अनुसार, यह निर्णय व्यावहारिक कठिनाइयों, संसाधनों की कमी और बेहद कम पारिश्रमिक के कारण लिया गया। संघ ने कहा कि शिक्षकों पर कठोर कार्रवाई करने के बजाय उनकी परिस्थितियों को समझा जाना चाहिए।

शिक्षक संगठन ने आरोप लगाया है कि पिछले लगभग आठ वर्षों से उनके दैनिक पारिश्रमिक में कोई वृद्धि नहीं की गई है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। शिक्षक संगठन के प्रतिनिधियों के अनुसार, मौजूदा मानदेय इतना कम है कि यह आने-जाने और अन्य बुनियादी खर्चों को भी पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। संगठन का कहना है कि ऐसी स्थिति में सौंपे गए अतिरिक्त कार्यों का निर्वहन व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है। इस मामले में आशीष सूद और शिक्षा विभाग से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। शिक्षक संगठन ने सरकार से मांग की है कि अतिथि शिक्षकों की स्थिति और वेतन संरचना पर पुनर्विचार किया जाए।

महासचिव अजय वीर ने अधिकारियों से आग्रह किया है कि प्रस्तावित बर्खास्तगी को वापस लिया जाए। साथ ही उन्होंने यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान अतिथि शिक्षकों के वार्षिक अनुबंध समाप्त न किए जाएं। उन्होंने कहा कि इन शिक्षकों को सरकार के जनगणना अभियान के तहत जनगणना गणक की भूमिका सौंपी गई थी, जिसे एक अनिवार्य सार्वजनिक कर्तव्य माना जाता है। ऐसे में उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई से उनकी आजीविका और सेवा दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

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