मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और शीर्ष अदालत के बीच तीखी बहस हो गई. केंद्र सरकार ने दलील दी कि चयन पैनल में प्रधानमंत्री की मौजूदगी पर भरोसा किया जाना चाहिए और यह मान लेना पूरी तरह गलत होगा कि प्रधानमंत्री या उनके कैबिनेट मंत्री किसी गलत मंशा से काम करेंगे. सरकार ने दलील दी कि चयन प्रक्रिया पर संदेह करना संसद की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाने जैसा है.

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला प्रधानमंत्री में अविश्वास का नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया में न्याय, पारदर्शिता और निष्पक्षता दिखने का है. केंद्र सरकार ने कोर्ट में इस बात पर सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री द्वारा गठित मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को क्यों शामिल किया जाना चाहिए. सरकार ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के निर्णय पर भरोसा नहीं किया जा सकता है तो मंत्रिमंडल मंत्रियों की नियुक्ति पर सलाह देने के लिए किसी “बाहरी व्यक्ति” या पूर्व न्यायाधीश को भी शामिल किया जाना चाहिए.

बात विश्वास की नहीं पारदर्शिता और निष्पक्षता की है- कोर्ट

बहस के दौरान केंद्र ने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि चयन प्रक्रिया में संख्या के हिसाब से बहुमत होने के कारण प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री गलत मंशा से काम करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “यह प्रधानमंत्री में अविश्वास का मामला नहीं है, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्तियों में दिखाए गए न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांत का मामला है.

याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि इस अधिनियम ने अनूप बर्नवाल मामले में संविधान पीठ के उस फैसले को “अमान्य” कर दिया है, जिसमें प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मुख्य चुनाव आयोग के चयन पैनल का गठन किया गया था और जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल थे. 2023 का अधिनियम, जो इस फैसले के कुछ ही महीनों के भीतर पारित हुआ, ने मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत कैबिनेट मंत्री को नियुक्त किया था.

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