वीरेंद्र गहवई, रायपुर। मवेशियों की तस्करी और उन्हें कत्लखानों तक ले जाने से जुड़े मामलों में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पुलिस द्वारा जब्त किए गए कृषि उपयोगी पशुओं को मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक आरोपी, वाहन चालक या कथित मालिक को सुपुर्दनामा पर नहीं सौंपा जा सकता। अदालत ने कहा कि ट्रायल पूरा होने तक ऐसे मवेशियों को केवल पंजीकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान की अभिरक्षा में ही रखा जाएगा।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि यदि पशु तस्करी के आरोपियों को ही जब्त मवेशी वापस सौंप दिए जाएं, तो छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 का मूल उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाएगा। अदालत ने कहा कि यह कानून कृषि उपयोगी पशुओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है और इसकी भावना के विपरीत कोई आदेश नहीं दिया जा सकता।

झारखंड ले जाए जा रहे थे 28 मवेशी

मामला जशपुर जिले के मनोरा पुलिस चौकी क्षेत्र का है। पुलिस ने ट्रक क्रमांक एचआर-55-क्यू-5980 को पकड़कर उसमें लदे 23 नर और 5 मादा भैंसों को जब्त किया था। जांच में सामने आया कि इन मवेशियों को छत्तीसगढ़ से झारखंड के कत्लखाने ले जाया जा रहा था।

इस मामले में झारखंड के गुमला निवासी मो. वसीम कुरैशी ने स्वयं को मवेशियों का मालिक बताते हुए उन्हें सुपुर्दनामे पर देने की मांग की थी। हालांकि, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) जशपुर ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। बाद में सेशन कोर्ट ने भी निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।

सिंगल बेंच से लार्जर बेंच तक पहुंचा मामला

निचली अदालतों के आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान सिंगल बेंच ने जलील अंसारी बनाम छत्तीसगढ़ शासन मामले में दिए गए पूर्व निर्णय पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की और पूरे प्रकरण को निर्णय के लिए डिवीजन (लार्जर) बेंच के पास भेज दिया।

विशेष कानून को मिलेगी प्राथमिकता

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा 7 और 18 स्पष्ट रूप से प्रावधान करती हैं कि मुकदमे के अंतिम निर्णय तक जब्त पशुओं को पंजीकृत गौशालाओं, गोसदनों या गोरक्षण संस्थानों की अभिरक्षा में रखा जाएगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिनियम एक विशेष कानून (Special Law) है, इसलिए ऐसे मामलों में इसकी व्यवस्था सामान्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के प्रावधानों पर प्रभावी रहेगी। ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट सामान्य धाराओं का सहारा लेकर आरोपियों, वाहन चालकों या कथित मालिकों को जब्त मवेशियों की सुपुर्दगी नहीं दे सकते।

कानून के उद्देश्य को नहीं किया जा सकता निष्प्रभावी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि पशु तस्करी के आरोपियों को ही जब्त मवेशी वापस सौंप दिए जाएं, तो इससे कानून बनाने का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। इसलिए ट्रायल पूरा होने तक ऐसे पशुओं को केवल पंजीकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान की अभिरक्षा में ही रखा जाएगा।

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