रायपुर। बरसात का मौसम है. एक समय था जब ऐसे समय में ग्रामीण छत्तीसगढ़ में बरसात के मौसम में किसान और मजदूर अपने पैरों में भदई और महिलाएँ अकतरिया पहनती थी। लेकिन अब यह विलुप्ति की ओर अग्रसर है।
ये पारंपरिक चमड़े की पादुकाएँ पैरों को बबूल के काँटों, अन्य नुकीले फौटों, कंकड़-पत्थरों तथा चोटों से सुरक्षित रखती थीं। विशेष रूप से कीचड़ और खेतों में काम करते समय इन्हें पहनना अत्यंत उपयोगी माना जाता था। गांव के मोची मृत पशुओं की खाल निकालकर लाते थे, और महुआ के बीज तथा छाल से उसे पारंपरिक विधि से पकाकर पुरुषों के लिए भदई और महिलाओं के लिए अकतरिया तैयार करते थे।
यह उनका पुश्तैनी व्यवसाय था। ये पादुकाएँ पूरी तरह चमड़े से बनाई जाती थी, जिनमें रबर या प्लास्टिक का बिल्कुल भी उपयोग नहीं होता था। जिस किसान के घर गाय या बैल की मृत्यु हो जाती थी, उसे मोची परंपरागत रूप से एक जोड़ी भाई या अकवरिया भेंटस्वरूप देता था।
यदि किसी को चमड़े की रस्सी (नाना) की आवश्यकता होती तो यह भी उपलब्ध करा देता था। इसे मुख्य फिसलन से बचने तथा कीचड़ में आसानी से चलने के लिए बनाया जाता था। इसका स्वरूप आधुनिक सैंडल जैसा था, किंतु यह उससे अधिक मजबूत, टिकाऊ और लंबे ‘समय तक चलने वाला होता था।
भदई और अकतरिया केवल बरसात में ही नहीं, बल्कि सर्दी और गर्मी के मौसम जाती थी। शौकीन में भी पहनी लोग इन्हें अंडी का तेल लगाकर मुलायम और चमकदार बनाकर पहनते थे। यह परंपरा वर्षों तक ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रही।
समय के साथ यह पारंपरिक कला लगभग विलुप्त हो गई है।अब न तो गाँवों के माची भदई और अकतरिया बनाते हैं और न ही लोग इन्हें पहनते हैं असली चमड़े से बनने के कारण इनकी लागत अधिक होती है, जबकि बाजार में उपलब्ध रेक्सीन और प्लास्टिक से बने सैंडल अपेक्षाकृत सस्ते मिल जाते हैं। आज गाँवों के अधिकांश मोची पारंपरिक पाटुकाएँ बनाने के बजाय कंपनी निर्मित जूते-चप्पलों की मरम्मत करते हैं, और उन्हीं का व्यापार करते हैं।
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