हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में शनिवार को न्याय व्यवस्था से जुड़े देश के दिग्गज एक मंच पर नजर आए। वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस ऑन ‘Enhancing Access to Justice’ में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था को लेकर बेहद महत्वपूर्ण और जमीन से जुड़ा संदेश दिया। उन्होंने अपने संबोधन में इंदौर की धरती और लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के न्याय की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय केवल अदालत में सुनाए जाने वाले फैसले का नाम नहीं है, बल्कि न्याय का असली अर्थ तब है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
CJI सूर्यकांत ने साफ कहा कि सिर्फ कानून बना देने, मंत्रालय खड़े कर देने या न्यायपालिका के जरिए ही न्याय का सपना पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए समाज के हर वर्ग, न्यायिक संस्थाओं, प्रशासन, लीगल सर्विस अथॉरिटी और जमीन पर काम करने वाले लोगों को मिलकर काम करना होगा।उनके संबोधन की खास बात यह रही कि उन्होंने न्याय व्यवस्था को केवल अदालतों और कानूनी प्रक्रिया के नजरिए से नहीं देखा, बल्कि संवाद, गरिमा और समावेश को न्याय तक पहुंच की तीन अहम शर्तों के रूप में सामने रखा।
अहिल्याबाई की धरती से न्याय की मिसाल
CJI सूर्यकांत ने इंदौर की धरती का जिक्र करते हुए लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के शासन और न्याय व्यवस्था को याद किया। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई होलकर निष्पक्ष न्याय के लिए जानी जाती थीं। उनके लिए न्याय के सामने व्यक्तिगत रिश्ते भी मायने नहीं रखते थे। उन्होंने अपने पुत्र तक को दंडित करने में संकोच नहीं किया था। यह उदाहरण देते हुए CJI ने न्याय के उस सिद्धांत को सामने रखा जिसमें शासक और आम नागरिक के बीच कोई भेदभाव नहीं होता और न्याय की कसौटी सभी के लिए समान रहती है। उन्होंने यह भी बताया कि अहिल्याबाई की शासन शैली में जनता से सीधा संवाद बेहद महत्वपूर्ण था। वे बिना किसी मध्यस्थ के किसानों और व्यापारियों से सीधे मिलती थीं। यानी सत्ता और जनता के बीच दूरी नहीं, बल्कि सीधा संवाद उनकी व्यवस्था की खासियत था।
CJI बोले- कानून अकेले न्याय नहीं दिला सकते
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्याय व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं हैं। मंत्रालय, न्यायपालिका और सरकारी संस्थाएं अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन इन सबके बावजूद अगर समाज के अंतिम व्यक्ति तक व्यवस्था नहीं पहुंचती तो न्याय अधूरा रह जाता है। उन्होंने कहा कि न्याय तक पहुंच का पहला स्तंभ संवाद है। उनके मुताबिक संस्थाओं को केवल जनता को कानून और अधिकारों के बारे में बताना ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता की समस्याओं को सुनना और उनसे सीखना भी चाहिए। यानी संवाद सिर्फ ऊपर से नीचे की दिशा में नहीं होना चाहिए, बल्कि दोतरफा होना चाहिए।
MP के आदिवासी से मुंबई की महिला तक, समस्या एक जैसी नहीं
CJI सूर्यकांत ने वेस्ट जोन की विविधता का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग इलाकों में रहने वाले लोगों की समस्याएं अलग हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय, गोवा के मछुआरों, गुजरात के प्रवासी मजदूरों और मुंबई की महिलाओं का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब समस्याएं अलग-अलग हैं तो उनका समाधान भी हर जगह एक जैसा नहीं हो सकता। किसी आदिवासी क्षेत्र की समस्या को समझने के लिए वहां की स्थानीय परिस्थितियों को समझना होगा। मछुआरों की समस्या अलग होगी, प्रवासी मजदूरों की चुनौतियां अलग होंगी और महानगरों में महिलाओं से जुड़े कानूनी मुद्दे अलग हो सकते हैं। इसलिए न्याय तक पहुंच के लिए स्थानीय भाषा, स्थानीय बोली, स्थानीय संस्कृति और स्थानीय जरूरतों को समझना जरूरी है।
‘केस’ नहीं, पहले इंसान को देखिए
CJI सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था में गरिमा यानी Dignity को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए न्याय का अनुभव उस वक्त शुरू नहीं होता, जब अदालत कोई फैसला सुनाती है। उसका न्याय व्यवस्था से पहला सामना उस समय हो जाता है, जब वह लीगल एड क्लिनिक या तालुका लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के कार्यालय में पहुंचता है। वहां उसे कैसे रिसीव किया जाता है? उसकी बात कितनी गंभीरता से सुनी जाती है? उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है? यही चीज उसके मन में पूरी न्याय व्यवस्था की पहली तस्वीर बनाती है।
अस्पताल की मिसाल देकर समझाया न्याय का मतलब
CJI ने न्याय व्यवस्था को समझाने के लिए अस्पताल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह किसी मरीज के इलाज में डॉक्टर और नर्स का व्यवहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, उसी तरह कानूनी मदद लेने पहुंचे व्यक्ति के साथ व्यवहार भी बेहद महत्वपूर्ण है। जिस व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ है, अगर वह न्याय की उम्मीद लेकर किसी लीगल एड ऑफिस पहुंचता है और वहां उसे सम्मान से सुना तक नहीं जाता, तो उसके लिए न्याय व्यवस्था का भरोसा वहीं कमजोर हो सकता है। इसलिए कानूनी सहायता देने वाले लोगों का व्यवहार केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।
गरीब को कानूनी मदद कोई चैरिटी नहीं
CJI सूर्यकांत ने गरीब, पिछड़े, आदिवासी, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग लोगों को मिलने वाली कानूनी सहायता को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को कानूनी सहायता देना दान या चैरिटी नहीं है। यह उनका संवैधानिक अधिकार है। संविधान समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था करता है। ऐसे में जरूरतमंद व्यक्ति को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना व्यवस्था की जिम्मेदारी है, किसी पर किया गया उपकार नहीं।
CJI का सबसे बड़ा सवाल- जो आपके पास नहीं पहुंच सकता, उसके पास कौन जाएगा?
जस्टिस सूर्यकांत ने समावेश यानी Inclusion को न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी बताया। उन्होंने कहा कि असली परीक्षा यह नहीं है कि आपके पास मदद मांगने के लिए कोई व्यक्ति पहुंचा और आपने उसकी मदद कर दी। असली परीक्षा यह है कि जो व्यक्ति आपके पास पहुंच ही नहीं सकता, आप उसके पास कैसे पहुंचेंगे। यही सवाल पूरे न्याय तंत्र के सामने उन्होंने रखा।
क्योंकि समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा हो सकता है जिसे अपने अधिकारों की जानकारी ही नहीं है। कोई आर्थिक मजबूरी के कारण अदालत तक नहीं पहुंच सकता, कोई भौगोलिक दूरी के कारण पीछे रह सकता है और कोई भाषा या सामाजिक परिस्थितियों के कारण अपनी बात सामने नहीं रख पाता। ऐसे व्यक्ति तक न्याय पहुंचाना ही ‘Access to Justice’ का वास्तविक मतलब है।
‘कोई पीछे न छूटे’- यही न्याय व्यवस्था की असली सफलता
CJI सूर्यकांत ने कहा कि विकास और न्याय की दौड़ में अगर समाज का एक भी व्यक्ति पीछे छूट जाता है तो व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। न्याय व्यवस्था की सफलता केवल अदालतों में मामलों के निपटारे से नहीं मापी जा सकती। सवाल यह भी होना चाहिए कि—क्या गरीब तक न्याय पहुंचा? क्या आदिवासी तक कानूनी मदद पहुंची? क्या महिला को उसके अधिकार की जानकारी मिली? क्या दूरदराज के गांव में रहने वाले व्यक्ति को सरकारी योजना और कानूनी अधिकार का लाभ मिला? अगर इन सवालों का जवाब हां है, तभी न्याय वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा माना जाएगा।
पैरालीगल वॉलंटियर्स को बताया ‘न्याय की सेना’
CJI सूर्यकांत ने पैरालीगल वॉलंटियर्स यानी PLVs की भूमिका को भी बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने इन्हें जमीन पर काम करने वाली ‘न्यायिक सेना’ के रूप में सामने रखा। गांवों, गलियों और मोहल्लों में रहने वाले लोगों तक कानूनी सेवाओं और सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने में PLVs की भूमिका अहम है। क्योंकि कई बार जिस व्यक्ति को कानून की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह अदालत या सरकारी कार्यालय तक पहुंचने की स्थिति में ही नहीं होता। ऐसे में PLV उसके और न्याय व्यवस्था के बीच पुल का काम कर सकता है।
PLV सिर्फ कार्यकर्ता नहीं, समाज सेवक
CJI ने पैरालीगल वॉलंटियर्स को केवल एक कर्मचारी या कार्यकर्ता की भूमिका तक सीमित नहीं माना। उन्होंने उन्हें समाज के बीच काम करने वाला सेवक बताया और महात्मा गांधी तथा विनोबा भावे जैसे समाज सुधारकों की निस्वार्थ सेवा भावना का संदर्भ दिया। संदेश साफ था कि न्याय की लड़ाई सिर्फ अदालत के भीतर नहीं लड़ी जाती। कई बार इसकी शुरुआत किसी गांव की गली, किसी गरीब के घर, किसी महिला की समस्या या किसी मजदूर की परेशानी सुनने से होती है।
अनुच्छेद 39A का सपना घर-घर पहुंचाने की चुनौती
CJI सूर्यकांत ने संविधान के अनुच्छेद 39A का उल्लेख करते हुए कहा कि समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता का संवैधानिक सपना तभी पूरा होगा, जब सम्मेलन और बैठकों में लिए गए फैसले कागजों तक सीमित न रहें। इन फैसलों का असर अंतिम घर तक पहुंचना चाहिए। यानी कॉन्फ्रेंस में चर्चा, भाषण और संकल्प के बाद असली चुनौती जमीन पर शुरू होती है। जिस व्यक्ति को कानून की जानकारी नहीं है, उसे जानकारी मिले। जिसे वकील की जरूरत है, उसे कानूनी सहायता मिले। जिसे सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा, उसे उसका अधिकार मिले। और जो न्याय व्यवस्था तक पहुंच ही नहीं पा रहा, व्यवस्था खुद उसके दरवाजे तक पहुंचे।
CJI का संदेश साफ- न्याय की दूरी कम करनी होगी
इंदौर में आयोजित इस महत्वपूर्ण कॉन्फ्रेंस से CJI सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल भी रखा और उसका रास्ता भी बताया। संवाद होगा तो समस्या समझ आएगी। गरिमा होगी तो भरोसा बनेगा। समावेश होगा तो कोई पीछे नहीं छूटेगा। इन तीनों को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी सिर्फ अदालतों की नहीं, बल्कि पूरे समाज और न्याय व्यवस्था से जुड़े हर व्यक्ति की है। इंदौर की उसी धरती पर, जहां लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने निष्पक्ष न्याय और जनता से सीधे संवाद की मिसाल कायम की थी, CJI सूर्यकांत ने आधुनिक न्याय व्यवस्था को भी उसी मूल भावना से जोड़ने का संदेश दिया। अब चुनौती सिर्फ न्याय देने की नहीं है… चुनौती यह है कि न्याय उस व्यक्ति तक भी पहुंचे, जो न्याय मांगने के लिए आपके दरवाजे तक पहुंच ही नहीं सकता।
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