अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के नवनिर्मित जिले मऊगंज से एक खौफनाक और हैरान करने वाली ग्राउंड रिपोर्ट हम आपके सामने लाए हैं, जो कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करती है। सरदमन गांव में बंदूक की नोक पर आदिवासियों को प्रताड़ित करने और उनकी पुश्तैनी जमीन छीनने वाले खनन माफिया का मामला जब लल्लूराम ने प्रमुखता से उठाया तो कलेक्ट्रेट से लेकर कमिश्नर दफ्तर तक हड़कंप मच गया।

लल्लूराम ने जब इस खबर को प्राथमिकता के साथ उठाया तो इस खबर का बड़ा असर यह हुआ कि आनन-फानन में कलेक्टर संजय कुमार जैन, पुलिस अधीक्षक (SP) सुरेन्द्र कुमार जैन और एसडीएम राजेश मेहता भारी पुलिस बल के साथ सरदमन गांव की धूल फांकने पहुंचे।

कलेक्टर-SP के सामने रो पड़े पीड़ित, मिला भारी-भरकम आश्वासन

जिस गांव की तरफ महीनों से किसी जिम्मेदार अधिकारी ने रुख नहीं किया था, वहां लल्लूराम की खबर के बाद पूरा प्रशासनिक अमला मौजूद था। पीड़ित आदिवासियों ने रो-रोकर अफसरों को अपनी पीड़ा सुनाई। आदिवासियों का दर्द सुनने के बाद कलेक्टर साहब ने हमेशा की तरह एक भारी-भरकम आश्वासन थमा दिया कि ‘नियम विरुद्ध काम करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।’ लेकिन असल कहानी अधिकारियों के आश्वासन पर खत्म नहीं होती, बल्कि उनके जाते ही शुरू होती है।

अफसरों की गाड़ियां मुड़ते ही फूटा महिलाओं का गुस्सा— ‘नहीं देंगे अपनी जमीन’

जिला प्रशासन का अमला जैसे ही गांव से रवाना हुआ, पीड़ित आदिवासी महिलाओं का गुस्सा फूट पड़ा। महिलाओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि प्रशासन सिर्फ मीठी-मीठी बातें करता है, लिखित में कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। हम अपनी पुश्तैनी जमीन क्रेशर संचालकों को किसी कीमत पर नहीं देंगे। उन्हें जहां से रास्ता निकालना हो निकालें, हमारी जमीन से नहीं।

ग्रामीणों का यह आक्रोश जायज भी है। उनका आरोप है कि जब-जब वे शिकायत लेकर स्थानीय थाने पहुंचे, पुलिस ने खनन माफिया और रसूखदारों को संरक्षण दिया और उल्टा पीड़ितों को ही प्रताड़ित कर धमकी दी गई।

‘500 रुपये की गोली खर्च नहीं करूंगा…’ की धमकी पर पुलिस का अजीब तर्क

इस पूरे मामले में प्रशासनिक व्यवस्था के दोहरे मापदंड भी उजागर हुए हैं। हरियाणा के रहने वाले ‘सिद्धिविनायक स्टोन क्रेशर’ के गुर्गे चिंटू सिंह, सोनू सिंह और रणवीर सिंह सरेआम राइफल लहराकर आदिवासियों को कीड़े-मकोड़े बताते हुए धमका रहे हैं। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल है जिसमें माफिया का गुर्गा कहता दिख रहा है कि ‘तेरे लिए 500 रुपये की गोली खर्च नहीं करूंगा…’। इस गंभीर धमकी पर सख्त एक्शन लेने के बजाय मऊगंज प्रशासन का अजीब तर्क है कि ‘बंदूक का लाइसेंस है!’ अब मऊगंज की जनता पूछ रही है कि क्या लाइसेंस मिल जाने से किसी रसूखदार को आदिवासियों की जान की कीमत लगाने और उन्हें बेघर करने की छूट मिल जाती है?

कलेक्टर के आने की भनक लगते ही मशीनें छुपाई, रिहायशी इलाके में 150 फीट गहरी खाई

क्रेशर संचालकों की मनमानी का आलम यह है कि रिहायशी इलाके में 150 फीट गहरी खाई खोद दी गई है। हैवी ब्लास्टिंग के कारण उड़ने वाले पत्थर बुजुर्गों की खाने की थाली में आकर गिर रहे हैं लेकिन खनिज विभाग को यह सब दिखाई नहीं देता। हद तो तब हो गई जब कलेक्टर के आने की भनक लगते ही खनन माफिया ने रातों-रात अपनी मशीनें छुपा दीं। सुनवाई के दौरान खुद माफिया ने कबूला कि वे ब्लास्टिंग की सूचना प्रशासन को नहीं देते थे। इसके बावजूद मौके पर कोई बड़ी ज़ब्ती नहीं हुई, सिर्फ ‘संयुक्त जांच’ का पुराना राग अलाप दिया गया।

भू-अधिकार पट्टे की जमीन पर बाहरी माफिया का कब्जा कैसे?

यह पूरा इलाका आदिवासी बाहुल्य है और इन परिवारों को यह जमीनें सरकार द्वारा ‘भू-अधिकार पट्टे’ के तहत मिली थीं। आज सबसे तीखा सवाल यही है कि आदिवासियों के हक की यह जमीन इन बाहरी खनन माफियाओं की जागीर कैसे बन गई? किस रसूखदार और अधिकारी के संरक्षण में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं? कलेक्टर और एसपी के दौरे के बाद भी गांव की महिलाएं डरी हुई हैं, क्योंकि उन्हें सरकारी कागजों से ज्यादा अपनी आंखों के सामने लहराती बंदूकों पर यकीन है। देखना होगा कि मऊगंज प्रशासन इस माफिया सिंडिकेट को तोड़ पाता है या आदिवासियों को न्याय के लिए फिर सड़क पर उतरना पड़ेगा।

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