राजधानी दिल्ली से स्वास्थ्य सेवाओं और ईएसआई की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक मामला सामने आया है। यहां एक बेटे ने अपने बीमार पिता की जान बचाने के लिए उन्हें अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया। एम्स में बेड नहीं मिलने के बाद उसने दूसरे अस्पतालों का रुख किया। यहां तक कि कर्मचारी राज्य बीमा (ESIc) निगम के पैनल में शामिल निजी अस्पतालों में भी पिता का इलाज कराया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। पिता के इलाज पर बेटे ने कुल 1.81 लाख रुपये खर्च किए। इसके बाद जब उसने ईएसआई निगम से इलाज की रकम वापस मांगी तो रेफरल प्रक्रिया का पालन नहीं करने का हवाला देकर भुगतान रोक दिया गया। हालांकि, अब दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ईएसआई की इस कार्रवाई को सेवा में कमी माना है।
ESI को 1.77 लाख रुपये ब्याज समेत लौटाने होंगे
पिता के इलाज पर बेटे ने करीब 1.81 लाख रुपये खर्च किए। इसके बाद जब उसने ईएसआई से इलाज की रकम वापस मांगी तो रेफरल प्रक्रिया का पालन नहीं करने का हवाला देकर भुगतान रोक दिया गया। अब दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ईएसआई की इस कार्रवाई को सेवा में कमी माना है और 1.77 लाख रुपये 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया है। जिला उपभोक्ता आयोग ने तिलक नगर स्थित ईएसआईसी निदेशालय (मेडिकल) को शिकायतकर्ता को 1.77 लाख रुपये 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ वापस करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा मानसिक परेशानी और मुकदमे में हुए खर्च की भरपाई के लिए 15 हजार रुपये अतिरिक्त देने का भी आदेश दिया गया है।
रेफरल प्रक्रिया का हवाला देकर रोका था भुगतान
मामले के मुताबिक, पिता की तबीयत गंभीर होने पर बेटे ने उन्हें एम्स में भर्ती कराने की कोशिश की, लेकिन वहां बेड उपलब्ध नहीं हो सका। इसके बाद उसने दूसरे अस्पतालों का रुख किया और ईएसआईसी के पैनल में शामिल निजी अस्पतालों में भी पिता का इलाज कराया। इस दौरान इलाज पर कुल 1.81 लाख रुपये खर्च हुए। पिता की मौत के बाद बेटे ने ईएसआईसी से मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति मांगी, लेकिन निगम ने रेफरल की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने का हवाला देकर भुगतान करने से इनकार कर दिया। इसके बाद बेटे ने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
‘मरीज की जान बचाना जरूरी, तकनीकी औपचारिकताएं नहीं’
जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष सुरेश कुमार गुप्ता और सदस्य हर्षाली कौर की पीठ ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। आयोग ने कहा कि जब किसी मरीज की जान बचाने के लिए तत्काल इलाज कराना जरूरी हो, तब रेफरल जैसी तकनीकी औपचारिकताओं के आधार पर मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति से इनकार करना उचित नहीं है। आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता अपने पिता को बेहतर से बेहतर इलाज दिलाने की कोशिश कर रहा था। ऐसे आपातकालीन हालात में रेफरल की तकनीकी प्रक्रिया को प्राथमिकता देना सही नहीं था।
अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ा है स्वास्थ्य का अधिकार
आयोग ने अपने फैसले में कहा कि स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है। केवल कागजी और तकनीकी कमियों के आधार पर मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। आयोग के मुताबिक, आपातकालीन चिकित्सा परिस्थितियों में मरीज और उसके परिवार की प्राथमिकता जान बचाना होती है। ऐसे में केवल प्रक्रियागत औपचारिकताओं के आधार पर आर्थिक राहत से इनकार नहीं किया जा सकता।
इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर काटता रहा बेटा
मामले के मुताबिक, सागरपुर निवासी शिकायतकर्ता संजीव कुमार पांडेय का परिवार ईएसआई योजना के तहत बीमित था। उनके पिता कपिल देव पांडेय की तबीयत बिगड़ने पर परिवार ने सबसे पहले लुधियाना के अस्पतालों में उनका इलाज कराया। इसके बाद बेहतर उपचार की उम्मीद में उन्हें दिल्ली लाया गया। यहां संजीव कुमार ने अपने पिता को एम्स और बत्रा अस्पताल समेत अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराने की कोशिश की। एम्स में बेड उपलब्ध नहीं होने के कारण परिवार को दूसरे अस्पतालों का रुख करना पड़ा।
बुजुर्ग पिता की इलाज के दौरान अस्पताल में मौत
बत्रा अस्पताल में भी राहत नहीं मिलने पर कपिल देव पांडेय को कालरा अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद उन्हें बसई दारापुर स्थित ईएसआई अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद 29 अक्टूबर 2016 को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। पिता के इलाज पर परिवार ने कुल 1.81 लाख रुपये खर्च किए थे। इसके बाद संजीव कुमार ने ईएसआई से इस रकम की प्रतिपूर्ति मांगी, लेकिन निगम की ओर से उन्हें केवल 4,615 रुपये ही दिए गए।
प्रक्रिया का पालन नहीं करने का दिया हवाला
ईएसआई ने भुगतान रोकने के पीछे दलील दी कि शिकायतकर्ता ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। निगम के मुताबिक, संबंधित अस्पताल या डिस्पेंसरी से रेफरल लिए बिना निजी अस्पतालों में इलाज कराया गया था। इसी आधार पर मेडिकल खर्च की पूरी प्रतिपूर्ति से इनकार कर दिया गया। इसके बाद संजीव कुमार ने ईएसआई के फैसले को चुनौती देते हुए जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
आयोग ने कहा- जान बचाना जरूरी, तकनीकी औपचारिकताएं नहीं
जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष सुरेश कुमार गुप्ता और सदस्य हर्षाली कौर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ईएसआई की कार्रवाई को सेवा में कमी माना। आयोग ने कहा कि जब किसी मरीज की जान बचाने के लिए तत्काल इलाज कराना जरूरी हो, तब रेफरल जैसी तकनीकी औपचारिकताओं के आधार पर मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति से इनकार करना उचित नहीं है। शिकायतकर्ता अपने पिता को बेहतर इलाज दिलाने की कोशिश कर रहा था। ऐसे हालात में रेफरल की तकनीकी प्रक्रिया को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए थी।
अनुच्छेद 14 और 21 का भी किया जिक्र
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ा है। केवल कागजी और तकनीकी कमियों के आधार पर मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। आयोग ने ईएसआईसी निदेशालय (मेडिकल) को शिकायतकर्ता को 1.77 लाख रुपये 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया है। इसके अलावा मानसिक परेशानी और मुकदमे के खर्च के लिए 15 हजार रुपये अतिरिक्त देने को कहा है।
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