2030 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) का झंडा ग्लासगो से गुजरात पहुंच गया है। गांधीनगर में आयोजित कैबिनेट मीटिंग के दौरान डिप्टी चीफ मिनिस्टर हर्ष सांघवी ने यह झंडा औपचारिक रूप से चीफ मिनिस्टर भूपेंद्र पटेल को सौंपा। इसके साथ ही गुजरात में 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की आधिकारिक तैयारियां शुरू हो गई हैं।
इस खास मौके पर ग्लासगो में गुजरात का प्रतिनिधित्व करने वाले पैरा-एथलीट राकेश भट्ट, रोहित मजगुल और पैरा टेबल टेनिस खिलाड़ी सोनल पटेल भी मौजूद थे। बैठक में पूरी राज्य कैबिनेट ने इस पल का उत्साह के साथ स्वागत किया।

CWG झंडे की मौजूदगी और महत्व
अब यह राष्ट्रमंडल ध्वज 2030 के खेलों के आयोजन तक गुजरात में ही रहेगा। यह झंडा राज्य में खेलों के प्रति उत्साह बढ़ाएगा और खिलाड़ियों को बेहतरीन प्रदर्शन के लिए प्रेरित करेगा।
ग्लासगो खेलों में भारत का प्रदर्शन बेहद शानदार रहा। भारत ने 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और 9 ब्रॉन्ज़ समेत कुल 39 मेडल जीतकर तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। भारतीय पैरा-एथलीटों ने भी इतिहास रचते हुए 3 गोल्ड, 2 सिल्वर और 2 ब्रॉन्ज़ मेडल अपने नाम किए, जिससे पोडियम पर पहुंचने का 20 साल लंबा इंतजार खत्म हुआ।
झंडा सौंपने की परंपरा क्यों खास है?
कॉमनवेल्थ गेम्स के समापन समारोह में झंडा अगले मेजबान देश को सौंपने की एक पुरानी और गरिमामय परंपरा है:
- मेजबानी का अधिकार: यह ध्वज आयोजन की जिम्मेदारी का प्रतीक है।
- परंपरा और एकता: यह गेम्स की निरंतरता, विश्वास और कॉमनवेल्थ देशों के बीच दोस्ती को मजबूत करता है।
- मूल्यों का प्रसार: यह झंडा निष्पक्ष खेल, आपसी सम्मान और विश्व बंधुत्व का संदेश देता है।
यह ध्वज केवल एक औपचारिक वस्तु नहीं है, बल्कि दुनिया को “खेल हम सबको जोड़ता है” का संदेश देने वाला शांति और भाईचारे का प्रतीक है।
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