कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़: कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने लोकसभा में किसानों और कॉरपोरेट घरानों को दिए गए कर्ज तथा कर्जमाफी को लेकर केंद्र सरकार से कई सवाल पूछे। उनके सवाल के जवाब में वित्त मंत्रालय ने वर्ष 2014-15 से 2025-26 तक के आंकड़े सदन के पटल पर रखे। सरकार के जवाब के मुताबिक, इस अवधि में बड़े उद्योग और सेवा क्षेत्र के खातों में करीब 9.95 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाला गया।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने अपने जवाब में बताया कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की ओर से बड़े उद्योग और सेवा क्षेत्र के बकाया कर्ज को वर्षवार बट्टे खाते में डाला गया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में यह राशि 31,723 करोड़ रुपये थी, जो 2018-19 में बढ़कर 1.48 लाख करोड़ रुपये और 2019-20 में 1.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
इसके बाद भी बड़े उद्योग और सेवा क्षेत्र के खातों में बट्टे खाते में डाले गए कर्ज की राशि लगातार हजारों करोड़ रुपये में रही। वर्ष 2025-26 में यह राशि 20,485 करोड़ रुपये दर्ज की गई। 12 वर्षों के इन आंकड़ों को जोड़ने पर कुल राशि करीब 9.95 लाख करोड़ रुपये बैठती है।
किसानों की कर्जमाफी पर सरकार ने क्या कहा?

दीपेंद्र हुड्डा ने सरकार से यह भी पूछा था कि वर्ष 2014 से 2025-26 के दौरान कृषि ऋण की कितनी राशि माफ की गई और इसका राज्यवार विवरण क्या है।
इसके जवाब में वित्त मंत्रालय ने कहा कि वर्ष 2013-14 से 2025-26 तक केंद्र सरकार ने कोई कृषि ऋण माफी नहीं की है। हालांकि, केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि कृषि ऋण माफी केंद्र और राज्य सरकारों की अलग-अलग योजनाओं के तहत हो सकती है।
सरकार बोली- बट्टे खाते में डालना कर्जमाफी नहीं
वित्त मंत्रालय ने कॉरपोरेट कर्ज के बट्टे खाते में डाले जाने को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। सरकार के अनुसार, किसी कर्ज को बट्टे खाते में डालना एक लेखांकन प्रक्रिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि कर्जदार को कर्ज से मुक्ति मिल गई।

सरकार ने बताया कि कर्ज बट्टे खाते में डालने के बाद भी संबंधित कर्जदार की देनदारी खत्म नहीं होती। बैंक ऐसे खातों में वसूली की कार्रवाई जारी रखते हैं। बैंकों को बट्टे खाते में डाले गए कर्ज की वसूली के लिए उपलब्ध कानूनी और अन्य उपायों का इस्तेमाल करने के निर्देश हैं। हुड्डा बोले- किसान से पाई-पाई वसूली, कॉरपोरेट के लाखों करोड़ बट्टे खाते में
सरकार के जवाब के बाद दीपेंद्र हुड्डा ने भाजपा सरकार पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि लोकसभा में सरकार के जवाब से सामने आया है कि पिछले 12 वर्षों में बड़े कॉरपोरेट और धनाढ्य वर्ग के करीब 10 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाला गया, जबकि किसानों की कोई केंद्रीय कृषि ऋण माफी नहीं की गई।
हुड्डा ने सरकार के इस तर्क पर भी सवाल उठाया कि बट्टे खाते में डालने से कर्जदार को कोई फायदा नहीं होता। उन्होंने पूछा कि अगर इससे कर्जदार को कोई राहत नहीं मिलती और बैंक वसूली की कार्रवाई जारी रखते हैं, तो फिर हर साल कॉरपोरेट घरानों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डालने की जरूरत क्यों पड़ती है?
उन्होंने कहा कि एक तरफ किसान अपने कर्ज की अदायगी के लिए संघर्ष करता है और उससे कर्ज की पाई-पाई वसूली की जाती है, जबकि दूसरी तरफ बड़े उद्योग और सेवा क्षेत्र के खातों में लाखों करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाला जा रहा है।
हुड्डा ने आरोप लगाया कि किसानों के साथ कर्ज के मामले में भाजपा सरकार का रवैया अलग और कॉरपोरेट घरानों के प्रति अलग है। उन्होंने कहा कि इस नीति की हकीकत अब देश का किसान समझ चुका है।
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