दिल्ली जिमखाना क्लब (Delhi Gymkhana Club ) की जमीन को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में कहा है कि अदालत के पास सार्वजनिक परिसरों से बेदखली की वैधानिक प्रक्रिया पर रोक लगाने का अधिकार नहीं है। केंद्र का तर्क है कि संबंधित कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है और उसमें न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं हैं। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थायी (Perpetual) लीज को विधिवत और कानूनी प्रक्रिया के तहत समाप्त कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि लीज समाप्त होने के बाद क्लब का परिसर पर वैधानिक अधिकार नहीं रह जाता। केंद्र ने यह भी कहा कि लीज समाप्त किए जाने के बाद एस्टेट ऑफिसर द्वारा जारी किया गया कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस पूरी तरह कानून के अनुरूप है।
सरकार ने अदालत को बताया कि Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Act (पीपी एक्ट) में स्पष्ट प्रावधान है कि बेदखली से जुड़े मामलों में सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक है। केंद्र का तर्क है कि जब संसद ने इस विषय के लिए एक विशेष वैधानिक व्यवस्था बनाई है, तब सामान्य न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित हो जाती है। अपने जवाब में केंद्र ने यह भी कहा कि पीपी एक्ट एस्टेट ऑफिसर द्वारा की जा रही कार्रवाई पर किसी भी प्रकार का स्थगन आदेश (इंजंक्शन) देने की अनुमति नहीं देता। सरकार का कहना है कि कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा और एस्टेट ऑफिसर ही मामले पर निर्णय लेने के लिए सक्षम प्राधिकारी हैं।
विजय खुराना ने अपनी याचिका में एस्टेट ऑफिसर की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की है। उनका तर्क है कि क्लब के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई की वैधता और प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा की जानी चाहिए। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि याचिकाकर्ता कानून में उपलब्ध वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन चल रही वैधानिक प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।
जस्टिस Avnish Jhingan की अदालत में इस मामले पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने क्लब सदस्य विजय खुराना और दिल्ली जिमखाना क्लब के कर्मचारियों की ओर से दायर दोनों याचिकाओं पर विचार किया। याचिकाओं में एस्टेट ऑफिसर द्वारा शुरू की गई कार्रवाई और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार का जवाब देर रात प्राप्त हुआ है। ऐसे में जवाब का अध्ययन करने और उस पर अपना प्रत्युत्तर (रिजॉइंडर) दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। इस पर अदालत ने याचिकाकर्ताओं को जवाब दाखिल करने का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर के लिए निर्धारित कर दी। अब अगली सुनवाई में केंद्र सरकार के जवाब और याचिकाकर्ताओं के प्रत्युत्तर पर विस्तार से बहस होने की संभावना है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत से पूछा गया कि क्या केंद्र सरकार का वह पूर्व आश्वासन जारी रहेगा, जिसमें कहा गया था कि एस्टेट ऑफिसर के समक्ष फिलहाल स्थगन (स्टे) की मांग की जाएगी। इस पर अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “स्पष्ट रूप से ऐसा ही होगा।”
केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा है कि सार्वजनिक परिसरों से बेदखली से जुड़े मामलों के लिए Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Act (PP Act) के तहत स्वतंत्र न्यायिक और अपीलीय व्यवस्था पहले से मौजूद है। ऐसे में एस्टेट ऑफिसर द्वारा जारी नोटिस के खिलाफ शिकायतों का उचित मंच वही है। केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि यदि याचिकाकर्ता को एस्टेट ऑफिसर के नोटिस या बेदखली प्रक्रिया पर कोई आपत्ति है, तो उन्हें एस्टेट ऑफिसर के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रखना चाहिए। सरकार के अनुसार, याचिकाकर्ता वहां अपनी सभी कानूनी दलीलें और आपत्तियां पेश कर सकते हैं, जिनमें क्लब की लीज समाप्त करने की वैधता को चुनौती देना भी शामिल है।
सरकार ने अदालत को बताया कि एस्टेट ऑफिसर को नोटिस जारी करने का अधिकार सीधे कानून से प्राप्त है। इसलिए केवल नोटिस जारी किए जाने के आधार पर उसकी वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती। केंद्र का कहना है कि वैधानिक प्रक्रिया को उसके निर्धारित मंच पर ही आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।अपने हलफनामे में केंद्र ने कहा कि दिल्ली जिमखाना क्लब को दी गई 28 फरवरी 1928 की स्थायी लीज को उसकी शर्तों के अनुसार 22 मई 2026 को समाप्त कर दिया गया था। सरकार के मुताबिक, लीज समाप्त होने के बाद क्लब का परिसर पर कब्जा PP Act की धारा 2(जी) के तहत वैध नहीं माना जा सकता।
केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में स्पष्ट किया है कि यह मामला किसी अनिवार्य भूमि अधिग्रहण (Compulsory Acquisition) का नहीं है, बल्कि लीज समझौते में निहित संविदात्मक अधिकारों के प्रयोग से जुड़ा हुआ है। केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि 28 फरवरी 1928 को हुए लीज समझौते में ही सरकार को यह अधिकार दिया गया था कि वह सार्वजनिक उद्देश्य की आवश्यकता होने पर लीज समाप्त कर परिसर का दोबारा कब्जा ले सकती है।
सरकार के अनुसार, 22 मई 2026 को लीज को उसी संविदात्मक प्रावधान के तहत समाप्त किया गया है। इसलिए इसे भूमि अधिग्रहण का मामला बताना उचित नहीं होगा। सरकार ने अदालत को बताया कि यह कार्रवाई किसी नए अधिग्रहण कानून के तहत नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के बीच हुए मूल लीज समझौते की शर्तों के अनुरूप की गई है। ऐसे में यह सरकार के वैध संविदात्मक अधिकारों का प्रयोग है। सरकार ने यह भी दोहराया कि यह मामला किसी अनिवार्य भूमि अधिग्रहण का नहीं है, बल्कि लीज समझौते में निहित संविदात्मक अधिकारों के प्रयोग का है। केंद्र का कहना है कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए परिसर का कब्जा वापस लेने का अधिकार मूल लीज की शर्तों में पहले से मौजूद था। दिल्ली जिमखाना क्लब की 27.3 एकड़ जमीन को लेकर केंद्र सरकार और क्लब सदस्यों के बीच कानूनी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रही है। मामले में अगली सुनवाई 3 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट में होगी, जहां लीज समाप्त करने और बेदखली की प्रक्रिया की वैधता पर विस्तृत बहस होने की संभावना है।
गौरतलब है कि 22 मई 2026 को भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने ‘रक्षा अवसंरचना को मजबूत और सुरक्षित बनाने’ का हवाला देते हुए क्लब की स्थायी (Perpetual) लीज समाप्त कर दी थी। इसके साथ ही क्लब को 5 जून तक परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद 29 जून को एस्टेट ऑफिसर बिपिन कुमार सिंह ने Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Act (PP Act) के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस में क्लब प्रबंधन और परिसर में रह रहे अन्य लोगों से पूछा गया कि उन्हें सार्वजनिक परिसर से बेदखल क्यों न किया जाए।
वहीं, क्लब सदस्य विजय खुराना ने सरकार की कार्रवाई को चुनौती देते हुए दावा किया है कि रक्षा अवसंरचना से जुड़े कारणों को स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है। उनके अनुसार, सरकार के तर्क सामान्य और अस्पष्ट हैं तथा वास्तविक कारणों को छिपाने के लिए उनका उपयोग किया जा रहा है। खुराना का कहना है कि यह कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना जबरन बेदखली का प्रयास है। याचिका में यह भी कहा गया है कि लीज समाप्त करने और उसके बाद जारी किए गए शो-कॉज नोटिस की वैधता पर गंभीर सवाल हैं। विजय खुराना को क्लब के 500 से अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त होने का दावा किया गया है।
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