दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने वर्ष 2012 में बिहार में एक ट्रेन में गैंगरेप की शिकार हुई महिला को 3 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है और वह इस दायित्व से केवल इसलिए नहीं बच सकता क्योंकि अपराध बाहरी लोगों द्वारा किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेलवे वैध टिकट लेकर यात्रा कर रहे यात्रियों को सुरक्षित यात्रा उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है। यदि सुरक्षा व्यवस्था में कमी के कारण किसी यात्री के साथ गंभीर अपराध होता है, तो रेलवे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता।
रेलवे की दलीलें हाईकोर्ट ने खारिज कीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 में बिहार में एक ट्रेन में गैंगरेप की शिकार महिला को 3 लाख रुपये का मुआवजा देने के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आदेश को बरकरार रखते हुए रेलवे की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि वैध यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है और वह इस दायित्व से बच नहीं सकता। दरअसल, रेलवे ने NHRC के मुआवजा आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। रेलवे का तर्क था कि मुआवजा तय करने का अधिकार केवल रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (Railway Claims Tribunal) के पास है और NHRC को ऐसा आदेश देने का अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं है।
रेलवे ने यह भी दलील दी कि इस अपराध में रेलवे के किसी कर्मचारी की संलिप्तता नहीं थी। घटना को बाहरी लोगों ने अंजाम दिया था, जिन्हें बाद में अदालत ने दोषी भी ठहराया। इसलिए रेलवे को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा रेलवे का कहना था कि घटना के समय ट्रेन स्टेशन पर खड़ी थी और उस दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के अधीन काम करने वाली गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (GRP) की थी, न कि रेलवे प्रशासन की।
गैंगरेप को ‘अनहोनी घटना’ मानते हुए हाईकोर्ट ने मुआवजा आदेश को सही ठहराया
दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 में बिहार में ट्रेन में गैंगरेप की शिकार महिला को 3 लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि इस तरह की घटना रेलवे अधिनियम के तहत ‘अनहोनी घटना’ (Untoward Incident) की श्रेणी में आती है। अदालत ने रेलवे की उन दलीलों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि गैंगरेप की घटना धारा 123 के तहत परिभाषित ‘अनहोनी घटना’ नहीं है और इसलिए धारा 124A के तहत मुआवजा नहीं दिया जा सकता। जस्टिस अमित बंसल की पीठ ने अपने फैसले में कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि गैंगरेप की घटना को ‘अनहोनी घटना’ की परिभाषा में शामिल किया जाएगा, क्योंकि यह एक हिंसक हमला है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम के प्रावधान केवल ट्रेन के भीतर होने वाली घटनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रेलवे प्लेटफॉर्म और रेलवे परिसर में होने वाले हिंसक हमलों को भी अपने दायरे में लेते हैं। इसलिए रेलवे यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि घटना ट्रेन के भीतर नहीं हुई या कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसी अन्य एजेंसी की थी। सुनवाई के दौरान रेलवे ने तर्क दिया था कि यह मामला ‘अनहोनी घटना’ की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मुआवजे का प्रावधान लागू नहीं होता। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि किसी वैध यात्री पर हुआ ऐसा गंभीर हिंसक अपराध रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे योग्य है।
मानवाधिकार आयोग बिना दांत का बाघ नहीं
जस्टिस अमित बंसल की पीठ ने कहा कि NHRC ने पीड़िता को त्वरित आर्थिक सहायता देने की सिफारिश कर अपने अधिकारों का उचित और वैध इस्तेमाल किया है। अदालत ने इस मामले में रेलवे की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें आयोग के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए गए थे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पूर्व न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि “मानवाधिकार आयोग कोई ‘बिना दांत का बाघ’ (toothless tiger) नहीं है, बल्कि जीवन और सम्मान के अधिकार का कट्टर रक्षक है।”
अदालत ने कहा कि मानवाधिकार आयोग का उद्देश्य केवल सलाह देना नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में प्रभावी हस्तक्षेप करना और पीड़ितों को न्याय दिलाने में सहायता करना है। कोर्ट के अनुसार, सरकारें या संबंधित संस्थाएं आयोग की सिफारिशों को अदालत में चुनौती दे सकती हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।
पीड़िता को 2 हफ्ते में मुआवजा देने का आदेश
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने याद दिलाया कि मई 2016 में जब रेलवे की याचिका स्वीकार की गई थी, तब NHRC के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई गई थी। साथ ही रेलवे को निर्देश दिया गया था कि वह 3 लाख रुपये की मुआवजा राशि दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराए। अब रेलवे की याचिका खारिज होने के बाद अदालत ने अपनी रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि जमा की गई राशि को उस पर अर्जित ब्याज सहित पीड़िता को सौंप दिया जाए। कोर्ट ने यह प्रक्रिया दो सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 27 अगस्त 2012 का है, जब बिहार के एक रेलवे स्टेशन पर खड़ी पैसेंजर ट्रेन में एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) की घटना हुई थी। घटना के बाद पीड़िता और उसके परिवार ने न्याय की लड़ाई शुरू की। पीड़िता के पिता ने 9 मार्च 2013 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि रेलवे परिसर में हुई इस गंभीर घटना ने पीड़िता के जीवन, गरिमा और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन किया है तथा सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक हुई है। मामले की जांच और सुनवाई के बाद NHRC ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। आयोग का मानना था कि एक वैध यात्री की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है और इस मामले में सुरक्षा व्यवस्था की विफलता सामने आई है।
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