पटना। शिक्षक भर्ती परीक्षा (TRE-4) की मांग को लेकर 8 मई को पटना में हुए बड़े आंदोलन के बाद गिरफ्तार हुए छात्र नेता दिलीप कुमार 16 दिन जेल में बिताने के बाद अब बाहर आ चुके हैं। जेल से बाहर आते ही दिलीप ने उन काले दिनों का जिक्र किया है, जो किसी भयावह सपने से कम नहीं थे। दिलीप का आरोप है कि जेल प्रशासन ने न केवल उन्हें शारीरिक यातनाएं दीं, बल्कि उन्हें मौत के खौफ के बीच रहने पर मजबूर किया।
सलाखों के पीछे पहली रात और सवाल
दिलीप कुमार ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें गांधी मैदान थाने की हाजत में रखा गया। उस रात नींद आना मुमकिन नहीं था। सलाखों के पीछे बैठते ही उनके मन में एक ही सवाल था क्या शिक्षा और रोजगार की मांग करना इतना बड़ा अपराध है कि एक छात्र नेता को जेल भेज दिया जाए?
लाठियों की गूंज और पुलिस का अत्याचार
जेल में शुरुआती दिन किसी तरह बीत गए, लेकिन 20 मई का दिन उनके लिए कयामत बनकर आया। दिलीप के अनुसार, उस दिन पुलिस ने उन्हें और उनके साथियों को बेरहमी से लाठियों से पीटा। हाथों, पीठ और कमर पर पड़ी लाठियों के निशान आज भी उनके दर्द को बयां कर रहे हैं। दिलीप का आरोप है कि पुलिस का मानना था कि जेल के अंदर से ही बाहर आंदोलन संचालित हो रहा है, इसी गुस्से में उन्होंने छात्रों को निशाना बनाया।
पेपर लीक माफियाओं के बीच बिताई डर भरी रातें
पिटाई के बाद दिलीप को ऐसी बैरक में डाल दिया गया, जहां पेपर लीक के वे आरोपी भी बंद थे जिन्हें दिलीप ने अपने प्रयासों से जेल भिजवाया था। यह स्थिति उनके लिए सबसे डरावनी थी। उन्होंने कहा, “जिस व्यक्ति को मेरी वजह से जेल हुई, उसके साथ उसी सेल में बंद होना मौत को दावत देने जैसा था। मुझे हर पल डर लगा रहता था कि वे लोग मुझ पर हमला कर सकते हैं।” डर के कारण उन्होंने दो दिनों तक खाना भी नहीं खाया और रातें जागते हुए बिताईं।
’हजारों सपनों का आंदोलन’
दिलीप कुमार ने स्पष्ट किया कि 8 मई का प्रदर्शन सिर्फ भीड़ का शोर नहीं, बल्कि हजारों युवाओं के सपनों की लड़ाई थी। विभाग ने खुद 46 हजार पदों पर भर्ती का वादा किया था, लेकिन जब वैकेंसी नहीं आई, तो अभ्यर्थियों के पास सड़क पर उतरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। अंत में उन्हें जेल और लाठियां नसीब हुईं।

