फतेहपुर. ​जनपद में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ . यू. बी. सिंह की नियुक्ति को अभी महज ढाई माह ही बीते हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली और प्रशासनिक व्यवहार को लेकर स्वास्थ्य विभाग में गहरा असंतोष पनप गया है. स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि जनपद के समस्त चिकित्साधिकारियों ने लामबंद होकर CMO के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. चिकित्साधिकारियों ने एक सामूहिक ज्ञापन सौंपकर साफ चेतावनी दी है कि यदि कार्य-वातावरण में तत्काल सुधार नहीं हुआ और उनके अधिकारों की बहाली नहीं की गई, तो सभी प्रभारी चिकित्साधिकारी और अधीक्षक अपने प्रशासनिक प्रभार से सामूहिक रूप से मुक्त हो जाएंगे.

​बता दें कि CMO पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े करते हैं.​ आरोप है कि प्रभारी चिकित्साधिकारियों द्वारा स्वीकृत आकस्मिक अवकाश (कैजुअल लीव) को भी CMO द्वारा अमान्य कर कर्मचारियों को अनुपस्थित दिखाया जा रहा है. बिना नोटिस वेतन रोकने जैसी कार्रवाइयों से कर्मचारियों में भय और मानसिक दबाव है. इसका सीधा असर मैदानी स्तर के महत्वपूर्ण कार्यों, जैसे- टीकाकरण, बाढ़ राहत कार्य और वीआईपी ड्यूटी पर पड़ रहा है. कर्मचारियों के स्थानांतरण (ट्रांसफर) आदेश जारी किए जाते हैं और फिर बिना किसी ठोस कारण के कुछ ही दिनों में उन्हें निरस्त या बदल दिया जाता है, जिससे विभाग में भ्रम की स्थिति बनी हुई है.

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वरिष्ठ चिकित्साधिकारियों की अनदेखी करते हुए ‘जिला क्षय रोग अधिकारी’ जैसे महत्वपूर्ण पद का प्रभार लेवल-2 के कनिष्ठ अधिकारी को सौंप दिया गया है. इससे वरिष्ठ अधिकारियों को अपने से कनिष्ठ के अधीन काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है. ओपीडी और इमरजेंसी ड्यूटी के बावजूद, रात 9 बजे वीडियो कॉल के जरिए उपस्थिति जांचने के तुगलकी फरमान से अधिकारी खुद को अपमानित और हतोत्साहित महसूस कर रहे हैं. कार्यस्थल के तनावपूर्ण माहौल के कारण 14 वर्षों से अधिक समय से सेवाएं दे रहीं दो वरिष्ठ महिला चिकित्सकों, डॉ. अपूर्वा पाल और डॉ. शिवानी बाजपेयी ने इस्तीफा दे दिया है. जिले में पहले ही महिला डॉक्टरों की भारी कमी है, ऐसे में यह एक बड़ा झटका है.

निरीक्षण के दौरान छोटी-छोटी कमियों या मामूली देरी पर संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त करने के लिए जिला स्वास्थ्य समिति में प्रस्ताव भेजने का अनुचित दबाव बनाया जा रहा है. नियमित ऑडिट होने के बावजूद, कई साल पुराने वित्तीय अभिलेखों को बार-बार मांग कर अधिकारियों को मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है. चिकित्साधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे जनहित और अपने शासकीय दायित्वों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. उनका उद्देश्य व्यवस्था को बाधित करना नहीं है, बल्कि सम्मानजनक और पारदर्शी कार्य-माहौल की मांग करना है. ​हालांकि, उन्होंने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनकी चिंताओं पर सहानुभूति पूर्वक विचार नहीं किया गया और उन्हें प्रशासनिक अधिकार व स्वतंत्र वातावरण नहीं मिला, तो वे केवल ‘चिकित्साधिकारी’ के रूप में मरीजों को देखेंगे और कोई भी प्रशासनिक जिम्मेदारी (प्रभारी/अधीक्षक का पद) नहीं संभालेंगे. भविष्य में भी कोई अन्य डॉक्टर यह प्रभार नहीं लेगा.