अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। हथकरघे की खट-खट को भले ही आधुनिक दौर में पुरानी तकनीक माना जाता हो, लेकिन डोंगरगढ़ में यही हथकरघा कई महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और रोजगार का मजबूत माध्यम बन गया है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद और उनकी सोच से शुरू हुआ ‘चल चरखा हथकरघा केंद्र’ आज एक बड़े रोजगार केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है। वर्ष 2016 में महज 9 हथकरघों से शुरू हुआ यह प्रकल्प अब 154 हथकरघों तक पहुंच गया है। इससे करीब 250 महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जुड़ी हैं।

केंद्र की योजना अब यहीं रुकने वाली नहीं है। आने वाले समय में 1008 हथकरघे स्थापित करने और करीब 1000 से 1500 महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इस पहल के जरिए हथकरघे के पारंपरिक हुनर को बचाने के साथ-साथ महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश की जा रही है।
9 से 154 हथकरघों तक का सफर

केंद्र से जुड़ी सपना दीदी बताती हैं कि ‘चल चरखा’ की शुरुआत वर्ष 2016 में सिर्फ 9 हथकरघों से हुई थी। शुरुआती दौर में धीरे-धीरे महिलाओं की संख्या और काम दोनों बढ़े। दो साल बाद हथकरघों की संख्या बढ़कर 54 हुई और इसके बाद यह आंकड़ा 108 तक पहुंचा। वर्तमान में यहां 154 हथकरघे संचालित हो रहे हैं।
उनके मुताबिक इस प्रकल्प का मुख्य उद्देश्य आसपास की जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराना है। बदलते बाजार और ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए यहां केवल पारंपरिक कपड़े ही तैयार नहीं किए जाते, बल्कि नए डिजाइन और आधुनिक जरूरतों के अनुरूप उत्पाद भी बनाए जा रहे हैं।
साड़ियों पर हैंड प्रिंटिंग, ब्लॉक प्रिंटिंग, एम्ब्रॉयडरी और बगरू प्रिंटिंग का काम किया जाता है। इसके अलावा कॉर्ड-सेट, शर्ट, जैकेट और सलवार-सूट जैसे परिधान भी तैयार किए जा रहे हैं।
‘चल चरखा’ नाम में छिपा है संदेश

‘चल चरखा’ नाम के पीछे भी एक खास विचार है। ब्रह्मचारिणी नेहा दीदी बताती हैं कि इस प्रकल्प का नाम आचार्य भगवन ने स्वयं ‘चल चरखा’ रखा था। इसके पीछे उद्देश्य लोगों को अपनी भारतीय संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली से दोबारा जोड़ना था।
आचार्यश्री का सूत्र था— ‘रुको-रुको, लौट चलें।’ नेहा दीदी के मुताबिक इसका भाव यह था कि आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति की दौड़ में आगे बढ़ते हुए व्यक्ति अपनी जड़ों और परंपराओं को न भूले। इसी सोच के साथ हथकरघे और भारतीय वस्त्र परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

आचार्यश्री अहिंसात्मक वस्त्रों के उपयोग को भी महत्व देते थे। ऐसी वस्त्र परंपरा को बढ़ावा देने की कोशिश की गई, जिसमें रोजगार के अवसर पैदा हों और लोग स्वदेशी तथा भारतीय जीवनशैली से भी जुड़ें। इसी विचार के तहत केंद्र में सूती और खादी के वस्त्रों को विशेष रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है।
हथकरघे ने बदली अश्वनी पारधी की जिंदगी

‘चल चरखा’ से जुड़ी महिलाओं के लिए यह काम महज रोजगार नहीं, बल्कि जिंदगी बदलने का जरिया बन रहा है। अश्वनी पारधी वर्ष 2017 से इस केंद्र से जुड़ी हैं। वह बताती हैं कि हथकरघे पर काम करने से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार आया है।
अश्वनी के मुताबिक उनकी बेटी की पढ़ाई-लिखाई भी इसी रोजगार से चल रही है। वह बताती हैं कि आचार्यश्री की कृपा और अपनी मेहनत से उन्होंने जमीन खरीदी और अपना घर भी बनाया।
उनके लिए हथकरघा सिर्फ काम करने की जगह नहीं है, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और परिवार को बेहतर जीवन देने का माध्यम बन चुका है।
हथकरघे के साथ हस्तशिल्प को भी बढ़ावा

रोजगार के दायरे को और बढ़ाने के लिए केंद्र में ‘चल चरखा हस्तशिल्प प्रशिक्षण’ भी संचालित किया जा रहा है। ज्योति दीदी बताती हैं कि हथकरघे पर तैयार होने वाले कपड़ों को और आकर्षक व उपयोगी बनाने के लिए उन पर कढ़ाई, बुनाई, एम्ब्रॉयडरी और आरी वर्क किया जाता है।
उनका कहना है कि कपड़े पर जितना अधिक काम होगा, उतने ही अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर बनेंगे। इस हस्तशिल्प इकाई से करीब 30 से 35 महिलाएं घर से काम करती हैं, जबकि कुछ महिलाएं केंद्र में आकर काम करती हैं।
आउटलेट से Amazon और Flipkart तक पहुंच रहे उत्पाद

महिलाओं और बालिकाओं को प्रशिक्षण देने के बाद उनके बनाए उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था भी की गई है। केंद्र का अपना आउटलेट है। इसके अलावा Amazon, Flipkart समेत अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए भी उत्पादों की बिक्री की जा रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर तैयार इन वस्त्रों को व्यापक बाजार मिल सके।
धागे से बाजार तक, एक ही प्रकल्प में रोजगार की पूरी कड़ी
डोंगरगढ़ का ‘चल चरखा’ अब केवल हथकरघा केंद्र तक सीमित नहीं है। यहां धागे से कपड़ा तैयार करने से लेकर उसे हस्तशिल्प के जरिए नया रूप देने, महिलाओं को प्रशिक्षण देने और तैयार उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यानी एक ही प्रकल्प में हथकरघा, हस्तशिल्प, प्रशिक्षण और रोजगार की पूरी कड़ी तैयार की गई है।
वर्ष 2016 में 9 हथकरघों से शुरू हुआ यह सफर आज 154 हथकरघों तक पहुंच चुका है। अब लक्ष्य 1008 हथकरघों का है। इसके साथ ही 1000 से 1500 महिलाओं को रोजगार से जोड़ने की योजना है।
डोंगरगढ़ में हथकरघे की यह खट-खट अब सिर्फ धागों को कपड़े में नहीं बदल रही, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने, परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और पारंपरिक हुनर को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कहानी भी बुन रही है।
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