अजय सैनी, भिवानी। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते वर्तमान परिवेश में युवा न केवल अपने संस्कार भूल गए हैं। बल्कि अपनी माटी की सोधी सुगंध को भी भूल गए हैं। इसी का यह असर है कि हम अपने से दूर होते जा रहे हैं। परिवार के बुजुर्ग का कोई ज्ञान नहीं युवा पीढ़ी पर प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा।

किसी भी समाज की संस्कृति उसकी धरोहर होती है। हरियाणा प्रदेश तीन दिशाओं से देश की राजधानी को घेरे हुए है। प्रदेश के आधे के करीब जिले एनसीआर क्षेत्र में है।
ऐसे में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण व शहरीकरण के बढ़ते हरियाणा के संस्कृति के वे भाग जो बड़े शहरों के पास है, वहां हरियाणवी संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव नजर आने लगा है। ऐसे में हरियाणवी संस्कृति से नई पीढ़ी परिचित रहे तथा हरियाणवी जनमानस अपनी संस्कृति को संजोए रखे व हरियाणा के पुराने लोगों द्वारा किए गए संघर्ष से परिचित रहे, उसके लिए भिवानी जिले के पुर गांव में सर्व कल्याण मंच हरियाणा द्वारा गांव में स्टाले लगाकर हरियाणवी संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया।
इस बारे में प्रदर्शनी देखने पहुंचे जिले भर से आए लोगों ने ना केवल प्रदर्शनी का अवलोकन किया, बल्कि ठेठ हरियाणवी परिधानों व हरियाणवी वाद्य यंत्रों के साथ हरियाणवी कलाकारों ने इस प्रदर्शनी में दर्शकों का मन मोहा।
इस प्रदर्शनी देखने पहुंचे प्रोफेसर धर्मवीर, ग्रामीण रीषिराम, युवक संदीप व अन्य लोगों ने बताया कि हरियाणवी संस्कृति से ओत-प्रोत इस प्रदर्शनी में पुराने समय में लोगों द्वारा प्रयोग होने वाली पुरानी करेंसी, पुराने समय में प्रयोग होने वाले मापतोल के उपकरणों, रसोर्ई में प्रयोग होने वाले चीनी मिट्टी के बर्तन, टोकनी, लालटेन, कृषि मेे प्रयोग होने वाले यंत्रों, रेहडू, पुरातन हल, गोपिया, फाली, रोशनी के लिए प्रयोग होने वाले लालटेन, दीवे, कढ़ावनी, रई, बिलौना सहित विभिन्न पुरातन हरियाणवी समाज से जुड़ी वस्तुओं का स्टॉल लगाकर प्रदर्शन किया गया। जिन्हे देखकर पुराने समय के लोगों ने अपने बचपन व जवानी को याद किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने बचपन व अपनी जवानी में इन उपकरणों व साधनों का प्रयोग किया है। आज ये आधुनिकता की दौड़ में उतने उपयोगी नहीं रहे है। लेकिन ये ठेठ हरियाणवी संस्कृति व हरियाणवी ग्रामीण जीवन को दर्शाते है कि किस प्रकार से हरियाणवी लोग सरलता से कम साधनों में अपना जीवन गुजारते थे तथा कड़ी मेहनत करते हुए कृषि कार्यो से अपना जीवन यापन करते थे।
वही इस मौके पर हरियाणवी वाद्य यंत्रों जैसे इकतारा, तुम्बा, ढ़ोल, ढ़हरू, ढफली, बीण व ठेठ हरियाणवी परिधान धोती, कुर्ता, दामन, गोटेदार चुनड़ी, पगड़ी, लहंगा में कलाकारों ने आगंतुकों का स्वाागत किया तथा वाद्य यंत्रों के साथ हरियाणवी संस्कृति से जुड़े संगीत भी का प्रदर्शन किया। लोगों ने हरियाणवी संस्कृति से जुड़े इन स्टॉलों का अवलोकन कर अपने पुराने दिनों को याद किया तथा नई पीढ़ी के बच्चों को यह बताने का प्रयास किया कि पहले हरियाणवी लोगों का जीवन कैसा था तथा किस प्रकार के साधनों का प्रयोग करते हुए वे अपना जीवन गुजारते थे।

