वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। हाईकोर्ट ने प्रदेश के रिटायर्ड शासकीय कर्मचारियों और पेंशनरों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 1 जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 तक के 32 महीने की पेंशन एरियर का भुगतान करने का निर्देश राज्य शासन को दिया है। कोर्ट ने 1 जनवरी 2006 से पहले सेवानिवृत्त पेंशनरों को वास्तविक वित्तीय लाभ 1 सितंबर 2008 से देने संबंधी शासन के परिपत्र को भेदभावपूर्ण मानते हुए निरस्त कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

बस्तर निवासी 80 वर्षीय सेवानिवृत्त प्रधान पाठक ज्ञानदत्त मिश्रा ने राज्य शासन के परिपत्र को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश शासन को अपने-अपने हिस्से का वित्तीय दायित्व वहन करते हुए 120 दिनों के भीतर एरियर का भुगतान सुनिश्चित करने कहा है। याचिकाकर्ता ज्ञानदत्त मिश्रा अविभाजित मध्य प्रदेश के समय शिक्षा विभाग में नियुक्त हुए थे। राज्य पुनर्गठन के बाद उनको छत्तीसगढ़ कैडर मिला। 31 जुलाई 2003 को प्रधान पाठक के पद से सेवानिवृत्त हुए।

इसके बाद राज्य सरकार ने एक जनवरी 2006 से लागू छठवें वेतनमान के आधार पर पेंशन पुनरीक्षण नियम 2009 जारी किया। हालांकि 31 अगस्त 2009 के परिपत्र के जरिए एक जनवरी 2006 से पहले सेवानिवृत्त पेंशनरों को पुनरीक्षित पेंशन का वास्तविक वित्तीय लाभ एक सितंबर 2008 से देने का निर्णय लिया गया। इसके चलते 32 महीने का एरियर्स रोक दिया गया।

हाईकोर्ट ने माना भेदभावपूर्ण

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा कि केवल सेवानिवृत्ति की तारीख के आधार पर पेंशनरों को अलग-अलग वर्ग में बांटना संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है। हाईकोर्ट ने पूर्व के फैसलों और सुप्रीम कोर्ट के मामले का उल्लेख करते हुए इस तर्क को स्वीकार किया। कोर्ट ने कहा कि महंगाई का प्रभाव सभी पेंशनरों पर समान रूप से पड़ता है। इसलिए कटऑफ तारीख के आधार पर पूर्व और बाद में सेवानिवृत्त पेंशनरों के बीच भेद करना उचित नहीं है।

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