हेमंत शर्मा, इंदौर। इंदौर में अवंतिका गैस पाइपलाइन विस्फोट मामले में एक बार फिर प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। इस हादसे में चार लोग गंभीर रूप से झुलस गए थे, जिनके इलाज और आर्थिक सहायता को लेकर हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान प्रशासन द्वारा प्रस्तुत किए गए शपथ पत्र पर विवाद खड़ा हो गया है।अवंतिका गैस पाइपलाइन विस्फोट में गंभीर रूप से झुलसी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर जिनी झाला (गिरी राजकुमारी झाला) को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के बाद एयरलिफ्ट करके अहमदाबाद के जायडस हॉस्पिटल (Zydus Hospital) में भर्ती कराया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि प्रशासन ने हाईकोर्ट में ऐसा शपथ पत्र पेश किया, जिसमें दावा किया गया कि पीड़ितों को स्वास्थ्य सहायता राशि का भुगतान कर दिया गया है। जबकि वास्तविकता यह थी कि भुगतान नहीं हुआ था। शिकायत के बाद यह तथ्य सामने आने पर प्रशासन की ओर से पेश किए गए शपथ पत्र की सत्यता पर सवाल उठ गए।
याचिकाकर्ता ने उठाए गंभीर सवाल
याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकारी अधिकारी यदि न्यायालय में गलत जानकारी देते हैं तो यह बेहद गंभीर मामला है। उनका कहना है कि अदालत को गुमराह करने का प्रयास नहीं होना चाहिए। हाई कोर्ट ने प्रशासन को 7 दिनों में सभी के पेमेंट करने के निर्देश दिए हैं और 7 दिन बाद इस याचिका पर सुनवाई की बात कही है याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया कि यदि भुगतान हुआ ही नहीं था, तो फिर शपथ पत्र में भुगतान होने की जानकारी किस आधार पर दर्ज की गई। उनका कहना है कि इस पूरे मामले की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
SDM घनश्याम धनगर का पक्ष
पूरे विवाद पर SDM घनश्याम धनगर ने सफाई देते हुए कहा कि हाईकोर्ट में दाखिल शपथ पत्र में किसी प्रकार की जानबूझकर गलत जानकारी नहीं दी गई। उनके अनुसार यह केवल टाइपिंग की गलती थी।SDM ने बताया कि शपथ पत्र में “पेमेंट प्रोसेस में है” लिखा जाना था, लेकिन टाइपिंग के दौरान गलती से “पेमेंट हो गया” (Paid) दर्ज हो गया। जैसे ही यह त्रुटि सामने आई, इसकी जानकारी तत्काल माननीय हाईकोर्ट को दे दी गई।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत ने इस पर किसी प्रकार की नाराजगी व्यक्त नहीं की और न ही उनके द्वारा किसी तरह की माफी मांगी गई। उन्होंने कहा कि बॉम्बे अस्पताल में इलाज संबंधी भुगतान किया जा चुका है, जबकि अन्य भुगतान की प्रक्रिया जारी है और निर्धारित समय के भीतर पूरा कर दिया जाएगा।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल
हालांकि SDM इसे टाइपिंग की गलती बता रहे हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट जैसे संवेदनशील मंच पर दाखिल होने वाले शपथ पत्रों की कई स्तरों पर जांच होती है। ऐसे में यदि तथ्यात्मक त्रुटि सामने आती है तो यह केवल टाइपिंग की गलती है या फिर लापरवाही, यह भी चर्चा का विषय बन गया है।कानूनी जानकारों का मानना है कि न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने वाले शपथ पत्र पूरी तरह सत्यापित दस्तावेज होते हैं। ऐसे दस्तावेजों में किसी भी प्रकार की गलती प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।
पीड़ितों को अब सात दिन का इंतजार
फिलहाल अभी पूरे मामले में इंदौर हाई कोर्ट ने प्रशासन को सख्त लिहाज्य में कहा है कि 7 दिन में पीड़ितों का पेमेंट कर कर हाई कोर्ट को सूचित करें और आप इस पूरे मामले की सुनवाई 7 दिन बाद की जाएगी और अब देखना होगा 7 दिन बाद प्रशासन पैसा पेट कर कर क्या हाई कोर्ट को सूचित करता है या फिर हाई कोर्ट की फटकार प्रशासन पर जारी रहेगी।


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