सुरेश पाण्डेय, सिंगरौली। करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं, लोकायुक्त जांच और FIR को लेकर सुर्खियों में रहे सिंगरौली के पूर्व प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) एस. बी.सिंह एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वजह है शहडोल संभाग में उन्हें सहायक संचालक का प्रभार सौंपा जाना।हैरानी की बात यह है कि जिस अधिकारी के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर एफआईआर दर्ज की जा चुकी है, उसी अधिकारी को महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंप दी गई है। इस फैसले ने न केवल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि शासन की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे है.

सिंगरौली शिक्षा विभाग का वह बहुचर्चित मामला, जिसने कभी प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया था, अब नए घटनाक्रम के साथ फिर चर्चा में आ गया है। आरोप है कि विभाग में विभिन्न योजनाओं, खरीद प्रक्रियाओं और वित्तीय लेन-देन से जुड़े मामलों में करोड़ों रुपये की अनियमितताएं हुईं। शिकायतों के बाद शुरू हुई जांच ने इतना गंभीर रूप लिया कि लोकायुक्त संगठन को FIR दर्ज करनी पड़ी।

READ MORE: रिटायर्ड लैब टेक्नीशियन से डेढ़ करोड़ की साइबर ठगी, खाते में काला धन कहकर डराया, 37 दिनों तक रही डिजिटल अरेस्ट

लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद यह माना जा रहा था कि जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारियों की भूमिका सीमित रह सकती है, लेकिन घटनाक्रम ने अलग मोड़ ले लिया। अब उन्हीं अधिकारियों में शामिल एक पूर्व DEO को शहडोल संभाग में सहायक संचालक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई है।

इस फैसले ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों से घिरे अधिकारी को जांच पूरी होने से पहले इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जानी चाहिए? क्या इससे जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल नहीं उठेंगे? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह फैसला शासन की जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरता है?

शिक्षा विभाग के भीतर और बाहर इस निर्णय को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार की सख्ती को लेकर गलत संदेश जा सकता है।

READ MORE: शिक्षकों के मैरिज सर्टिफिकेट अनिवार्यता में छूट, ऑनलाइन ट्रांसफर में राहत, वैकल्पिक दस्तावेज दे सकेंगे

हालांकि, कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो केवल FIR दर्ज होना किसी व्यक्ति को दोषी नहीं बनाता। भारतीय न्याय व्यवस्था में आरोप साबित होने तक हर व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। यही कारण है कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।

फिर भी यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि सिंगरौली का शिक्षा विभाग प्रकरण प्रदेश के सबसे चर्चित वित्तीय अनियमितता मामलों में गिना गया। लोकायुक्त FIR के बाद यह मामला लंबे समय तक राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बना रहा। अब उसी प्रकरण से जुड़े अधिकारी को नई जिम्मेदारी मिलने के बाद मामला एक बार फिर सुर्खियों में लौट आया है।

शासन के इस फैसले पर उठ रहे सवालों के बीच अब सबकी नजर लोकायुक्त जांच की अगली कार्रवाई पर टिकी है। जांच क्या नया खुलासा करती है, आरोप कितने साबित होते हैं और क्या सरकार इस विवाद के बीच कोई नया रुख अपनाती है—यह आने वाला समय तय करेगा। फिलहाल इतना जरूर है कि लोकायुक्त FIR के साए में मिली यह नई कुर्सी प्रशासनिक गलियारों में चर्चा और बहस का बड़ा विषय बन गई है।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m