कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के अधीन कार्यरत एक प्रशिक्षण अधिकारी की नौकरी पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया। राउज एवेन्यू कोर्ट ने फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी पद हासिल करने के मामले में प्रशिक्षण अधिकारी गौरव मलिक को दोषी ठहराया है।
अदालत की जांच में सामने आया कि जिस कंपनी में नौकरी करने का दावा करते हुए अनुभव प्रमाणपत्र पेश किया गया था, उस कंपनी का अस्तित्व ही उस समय नहीं था। आरोपित ने दस्तावेज में वर्ष 1993 से कार्यरत होने का उल्लेख किया था, जबकि संबंधित कंपनी की स्थापना वर्ष 1995 में हुई थी। इस खुलासे ने पूरे मामले की सच्चाई उजागर कर दी।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मयंक गोयल ने अपने फैसले में गौरव मलिक को धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेजों के उपयोग और साक्ष्य से छेड़छाड़ से जुड़े आरोपों में दोषी माना। हालांकि, जालसाजी से संबंधित एक आरोप में अदालत ने उन्हें राहत देते हुए बरी कर दिया।
1993 की नौकरी का दावा, लेकिन कंपनी बनी 1995 में
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, गौरव मलिक ने प्रशिक्षण अधिकारी (व्यावसायिक सेवाएं) पद के लिए आवेदन करते समय भोपाल स्थित कृष्णा इंजीनियरिंग कंपनी का अनुभव प्रमाणपत्र जमा किया था। इस दस्तावेज में दावा किया गया था कि वह 10 मार्च 1993 से कंपनी में सेल्स मैनेजर के रूप में कार्य कर रहा था।
इसी अनुभव के आधार पर उसका चयन हुआ और उसे सरकारी नौकरी मिल गई। लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान कंपनी के साझेदार राकेश अग्रवाल ने स्पष्ट रूप से कहा कि गौरव मलिक कभी उनकी कंपनी का कर्मचारी नहीं रहा। उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी की शुरुआत ही वर्ष 1995 में हुई थी, जिससे प्रमाणपत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
यूपीएससी अधिकारी की गवाही भी बनी अहम
मामले में यूपीएससी के तत्कालीन उप सचिव ने अदालत को बताया कि आवेदन पत्रों की जांच के बाद योग्य उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था। प्रस्तुत दस्तावेजों और अनुभव के आधार पर ही गौरव मलिक का चयन किया गया था।
हालांकि, बाद में हुई जांच और अदालत में पेश गवाहियों से यह साबित हो गया कि अनुभव प्रमाणपत्र में दर्ज जानकारी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थी। इसी आधार पर अदालत ने आरोपित को दोषी करार दिया।
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