EXCLUSIVE : …जब दो नदी, दर्जन भर नाले को पार कर पहुँचे अधिकारी और पत्रकार, तो ग्राउंड ज़ीरो में दिखी हैरान-परेशान करने वाली तस्वीरें 

गरियाबंद. छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित उदंती टायगर रिजर्व में ओडिशा से आए लोगों की घुसपैठ की शिकायत पर रायपुर से टीम ने जाकर दो दिनों तक ग्राउंड ज़ीरो का जायज़ा लिया.इस टीम के साथ लल्लूराम डॉट कॉम की टीम भी गई थी. लल्लूराम डॉट कॉम की टीम ने दो दिन तक घने जंगलों में जाकर ज़मीनी हकीकत को जाना और समझा.लल्लूराम डॉट कॉम की टीम ने जो जांच की, उसकी रिपोर्ट कड़ियों में प्रकाशित कर रही है. आज इसकी दूसरी रिपोर्ट प्रकाशित की जा रही है.

पढ़ें पहली रिपोर्ट- ओडिशा के लोगों को जंगल में बसाने के मामले की पड़ताल, लल्लूराम डॉट कॉम पहुंची उदंती के नक्सल प्रभावित इलाके में 

लल्लूराम डॉट कॉम की टीम 3 अक्टूबर को इस बात की पड़ताल करने ग्राउंड जीरो के लिए रवाना हुई कि उदंती के बड़े इलाके में अब भी ओडिशा वाले अवैध रुप से बसे हुए हैं. वे घने जंगलों में खेती कर रहे हैं. पड़ताल इस बात की भी होनी थी कि जंगल कितने इलाके में कटे हैं
लल्लूराम डॉट कॉम की टीम रायपुर से रवाना होकर सुबह 11 बजे गरियाबंद पहुंची. गरियाबंद में फॉरेस्ट का जांच दल एपीसीसीएफ देवाशीष दास, सीसीएफ वाइल्ड लाइफ एचएल रात्रे, डीएफओ गरियाबंद मयंक अग्रवाल और उदंती टायगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर विष्णु शामिल थे. यहां से गरियाबंद के स्थानीय पत्रकार भी इस जांच दल के साथ हो गए और उदंती के  कंपार्टमेंट नंबर 1204,1205,1208 और 1210 के इलाके के ग्राउंड जीरो के सफर पूरा करने का खाका तैयार किया गया.
ग्राउंड ज़ीरो तक पहुंचने के लिए दो रास्ते थे. पहले रास्ते से धनौरा और पीपलखुंटा गांव से 12 किलोमीटर पैदल चलकर वहां पहुंचा जा सकता था.
दूसरा रास्ता करलाझार होकर जाता है. जिसमें कुछ सफर कार से, कुछ बाइक से और बाकी 3 किलोमीटर पैदल चलना था. टीम ने धनौरा गांव वालों से फोन पर बातकर ये तय किया कि करलाझार के रास्ते ही हल्दीकछार पहुंचा जाए. गांव वाले पहाड़ चढ़कर हल्दीकछार पहुंचने के हामी थे.
दोपहर करीब 1 बजे तौरेंगा से टीम करलाझार के लिए रवाना हुए. मैनपुर के बाद सभी के मोबाइल ने काम करना बंद कर दिया. करीब आधे घंटे का सफर करने के बाद टीम करलाझार पहुंच गई.करलाझार में चाहपहिए वाहन को छोड़कर टीम के सदस्यों ने घुटने तक पानी वाले उदंती को पार किया.
उसके बाद करलाझार से कोई 8 किलोमीटर का सफर बाइक पर हुआ. बाइक पर सफर शुरु करने के कुछ देर बाद की हमें कई जगह कटे पेड़ दिखे. लेकिन बड़ी कटाई के लिए हमें फिर से उन जंगलों में घुमकर बहने वाली उदंती के किनारे पहुंचना था.
लेकिन उदंती नदी तक घने जंगलों के बीच जिन पगडंडियों से होकर पहुंचना था, वो पगडंडियां कीचड़ से सन चुकी थीं. लिहाज़ा उंदती नदी से एक किलोमीटर पहले ही हमें पैदल का सफर शुरु करना पड़ा.
नदी पार करते हुए हमने रायपुर से आए आईएफएस देवाशीष दास और सीसीएफ वाइल्ड लाइफ एचएल रात्रे से बात की. देवाशीष दास ने बताया कि जांच इस बात की हो रही है कि ग्राउंड ज़ीरो के ज़मीनी हालात क्या हैं और जो कार्रवाई की गई है वो क्या काफी है.
वहीं एचएल रात्रे का कहना है कि 20 सितंबर को फ्लाइंड स्क्वॉयड भेजकर 26 ओडिशा के अतिक्रमणकारियों को जेल भेजा गया और कटे हुए पेड़ों की गिनती की गई. रात्रे का कहना था कि करीब 3 हैक्टेयर जंगल को इन लोगों ने काटा था. रात्रे का कहना है कि इससे पहले भी क्षेत्र में लगातार कार्रवाई की गई है लेकिन ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है कि कर्मचारियों ने शिकायत मिलने पर कार्रवाई न की हो.
नदी पार कर करीब 3 किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम हल्दीकछार के उस जगह पहुंचे जहां पेड़ों की कटाई की शिकायत ग्रामीणों ने की थी. यहां पहुंचकर जो हमने देखा वो जितना मायूस करने वाला था. उतना ही हैरान करने वाला भी था.
हल्दीकछार का इलाका शुरु होने से पहले ही ग्राउंड के आकार का जंगल ज़मीन पर कटा पड़ा था. बीच में रास्ता था और दोनों तरफ पेड़ कटे थे. लेकिन ये केवल शुरुआत थी. आगे इससे और भयावह मज़र देखना शेष थे. लेकिन जिस बात को लेकर हमें हैरानी हो रही थी वो ये थी कि हल्दीकछार में जो वन प्रबंधन समिति सक्रिय है, उसके तमाम सदस्य वहां पहले से ही पहुंचे हुए थे. हैरानी का एक सबब ये भी था कि इन तमाम चेहरों में से वो चेहरा नहीं था, जिसने इस क्षेत्र में जंगल और घुसपैठ की शिकायत की हो. सबके चेहरे पर एक ही सवाल था कि धनौरा गांव के शिकायतकर्ता कहां रह गए और उनसे संपर्क कैसे किया जाए
(क्रमश:)

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