गुजरात हाईकोर्ट ने भूख से तंग आकर अपनी दो साल की मासूम बेटी की पीट-पीटकर हत्या करने की आरोपी महिला को जमानत दे दी है। अदालत ने इस दिल दहला देने वाली घटना को महज एक अपराध न मानकर पूरे समाज की सामूहिक विफलता और सामाजिक कल्याण तंत्र की नाकामी करार दिया है।

जस्टिस हसमुख डी. सुथार की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भूख केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, न्याय और सामाजिक विवेक से जुड़ा विषय है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब अत्यधिक गरीबी और भुखमरी के कारण ऐसे हालात बनते हैं, तो यह राज्य और समाज की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे कमजोर परिवारों, महिलाओं और बच्चों की रक्षा करें।

फैसले में साहित्य और दार्शनिकों का जिक्र

अपने फैसले को वैचारिक गहराई देते हुए कोर्ट ने कई ऐतिहासिक और साहित्यिक संदर्भ दिए:

  • संवैधानिक दायित्व: संविधान के तहत छह साल तक के बच्चों को पोषण, प्रारंभिक देखरेख और शिक्षा का अधिकार हासिल है।
  • साहित्यिक संदर्भ: कोर्ट ने पन्नालाल पटेल के प्रसिद्ध गुजराती उपन्यास ‘मानवीनी भवाई’ और विक्टर ह्यूगो के ‘लेस मिजरेबल्स’ का हवाला दिया, जो गरीबी और मानवीय लाचारी के दर्द को दर्शाते हैं।
  • दार्शनिक और धार्मिक विचार: महात्मा गांधी, अरस्तू, चार्ल्स डिकेंस और विभिन्न धार्मिक ग्रंथों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि भूखे को भोजन कराना समाज का सबसे पवित्र कर्तव्य है।

पारिवारिक और मानवीय स्थितियों पर ध्यान

मामला सूरत के वराछा पुलिस स्टेशन का है, जहां आरोपी लखीबेन सोलंकी को मार्च 2026 में गिरफ्तार किया गया था। महिला के वकील ने कोर्ट को बताया कि पति के छोड़ जाने के बाद वह बेहद विषम परिस्थितियों में रह रही थी। महिला वर्तमान में सात महीने की गर्भवती है, उसका एक बच्चा उसके साथ जेल में है और दूसरा घर पर अकेला है।

सरकारी वकील ने जमानत का विरोध किया, लेकिन कोर्ट ने महिला की स्थिति और घटना के पीछे छिपी भयंकर लाचारी को देखते हुए उसे जमानत राहत दे दी।

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