अहमदाबाद। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने ‘प्राकृतिक कृषि संवाद’ के दौरान किसानों से यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों का प्रयोग तुरंत बंद कर ज़हरमुक्त खेती अपनाने का आह्वान किया है। उन्होंने बताया कि रसायनयुक्त खेती का असर इतना गंभीर हो चुका है कि 105 माताओं के दूध परीक्षण में यूरिया, कीटनाशक और डिटर्जेंट के अंश पाए गए हैं।

राज्यपाल ने कुरुक्षेत्र स्थित अपने गुरुकुल की 180 एकड़ जमीन पर सफल प्राकृतिक खेती के प्रयोगों का उदाहरण देते हुए कहा कि रासायनिक खादों ने मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर दिया है। हरित क्रांति के समय मिट्टी में कार्बन की मात्रा 2 से 2.5 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 0.2 से 0.3 प्रतिशत (बंजर भूमि के समान) रह गई है। यूरिया और कीटनाशक ज़मीन के नीचे सीमेंट जैसी सख्त परत बना रहे हैं, जिससे लाभदायक बैक्टीरिया और केंचुए समाप्त हो रहे हैं।

इस अवसर पर उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट की तुलना में जीवामृत और घनजीवामृत को अधिक प्रभावी बताया।

जीवामृत तैयार करने की विधि:

देशी गाय के एक ग्राम गोबर में 300 करोड़ सूक्ष्म बैक्टीरिया होते हैं। तरल जीवामृत बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया जाता है:

  • देशी गाय का गोबर
  • गौमूत्र
  • गुड़
  • बेसन (किसी भी दाल का आटा)
  • सजीव मिट्टी

यह मिश्रण मिट्टी को पुनर्जीवित करता है, जिससे सूक्ष्म जीव और केंचुए पुनः सक्रिय होकर पौधों को प्राकृतिक नाइट्रोजन और पोषण प्रदान करते हैं।

सरकारी प्रोत्साहन और व्यवस्थाएं:

  • वित्तीय सहायता: कृषि मंत्री जीतूभाई वाघाणी ने बताया कि प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को देशी गाय के रखरखाव के लिए ₹12,000 प्रतिवर्ष दिए जा रहे हैं।
  • सफलता के आंकड़े: कृषि विभाग के प्रधान सचिव आर.सी. मीणा के अनुसार, राज्यपाल के मार्गदर्शन में अब तक 9 लाख किसान इस अभियान से जुड़ चुके हैं। इसके लिए 48,900 क्लस्टर और 7,500 मॉडल फार्म बनाए गए हैं।
  • बाजार की सुविधा: सूचना सचिव डॉ. विक्रांत पांडे के अनुसार, मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के निर्देशों पर प्राकृतिक कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए राज्य भर में 300 बिक्री केंद्र (ऑनलाइन व ऑफलाइन) शुरू किए गए हैं।

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