कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। ग्वालियर में स्कूलों को दूसरी जगह शिफ्ट करने के फैसले से छोटे बच्चों की पढ़ाई पर पड़ने वाले असर को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब तलब करते हुए यह स्पष्ट करने को कहा है कि स्कूल शिफ्ट करने के इस निर्णय में बच्चों के शिक्षा के अधिकार और RTE के प्रावधानों का पूरी तरह पालन किया गया है या नहीं।

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बच्चों को तय करनी पड़ रही है लंबी दूरी

दरअसल, स्कूलों को दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने के कारण छोटे बच्चों को पढ़ाई के लिए चार किलोमीटर तक की लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की पीठ ने राज्य सरकार को इस मामले में अपना अतिरिक्त जवाब दाखिल करने के लिए महज दो दिन का समय दिया है। साथ ही न्यायालय ने स्कूल शिफ्ट करने से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज और रिकॉर्ड भी पेश करने के कड़े निर्देश दिए हैं।

शासन से मांगा गया नीतिगत आधार

सुनवाई के दौरान शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पहले अतिरिक्त जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा गया था। हालांकि, प्रत्येक निर्णय के पीछे के दस्तावेज और नीतिगत आधार प्रस्तुत करने के लिए अदालत ने सरकार को दो दिन का समय दिया है। गौरतलब है कि इससे पहले पिछली सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने प्राथमिक स्कूलों के जर्जर भवनों और उनकी मरम्मत नहीं कराए जाने के मुद्दे पर सरकार से कड़ा जवाब मांगा था।

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याचिकाकर्ता ने उठाए आरटीई के प्रावधानों पर सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से आरटीई के नियमों का हवाला देते हुए अदालत को बताया गया कि प्राथमिक कक्षाओं के छोटे बच्चों को स्कूल तक पहुँचने के लिए लंबी दूरी तय करने जैसी कठिन स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। इस आगामी सुनवाई के दौरान कोर्ट की नजर सरकार के जवाब और स्कूलों को शिफ्ट करने से जुड़े दस्तावेजों पर रहेगी। इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल यह है कि स्कूलों को स्थानांतरित करने के इस फैसले में छोटे बच्चों की सुविधा और उनके शिक्षा के अधिकार को आखिर कितनी प्राथमिकता दी गई है।

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