बीमा पॉलिसी लेने के महज 25 दिन बाद व्यक्ति की मौत पर कैंसर का आरोप लगा क्लेम रोकने वाली कंपनी को हाई कोर्ट ने तगड़ा झटका दिया है। अदालत ने परमानेंट लोक अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए पत्नी को राहत दी है।
चंडीगढ़। बीमा पॉलिसी लेने के मात्र 25 दिन बाद व्यक्ति की मौत होने और बीमा कंपनी द्वारा कैंसर की बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर क्लेम खारिज किए जाने के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मृतक की पत्नी को बड़ी राहत दी है। हाई कोर्ट ने परमानेंट लोक अदालत के उस पुराने आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसमें बीमा कंपनी को 14.22 लाख रुपये का डेथ बेनिफिट देने के निर्देश दिए गए थे। न्यायमूर्ति जगमोहन बंसल ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी अपने दावों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही है।
कंपनी नहीं दे सकी बीमारी के पुख्ता सबूत
मामले के अनुसार, समुंदर सिंह ने 23 मार्च 2018 को भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस कंपनी से एक जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। इस पॉलिसी की मूल बीमित राशि 7.11 लाख रुपये थी, जबकि मृत्यु की स्थिति में डेथ बेनिफिट 14.22 लाख रुपये तय किया गया था। उन्होंने पहली प्रीमियम राशि के रूप में 63 हजार 172 रुपये जमा करवाए थे, लेकिन इसके ठीक 25 दिन बाद 25 अप्रैल 2018 को उनकी अचानक हार्ट अटैक आने से मौत हो गई। इसके बाद बीमा कंपनी ने गंभीर बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर क्लेम देने से मना कर दिया था।
फर्जी और अधूरे दस्तावेजों पर कोर्ट की फटकार
बीमा कंपनी ने 31 मार्च 2019 को दावा खारिज करते हुए दलील दी थी कि समुंदर सिंह साल 2017 से कैंसर से पीड़ित थे। दावा खारिज होने पर मृतक की पत्नी ने परमानेंट लोक अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसने 2 अप्रैल 2025 को महिला के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके खिलाफ कंपनी हाई कोर्ट पहुंची, जहां अदालत ने पाया कि कंपनी जिन मेडिकल रिपोर्टों की फोटोकॉपी पर भरोसा कर रही थी, उन पर न तो किसी डॉक्टर के हस्ताक्षर थे और न ही वे अस्पताल से सत्यापित थीं। अलग-अलग सीआर नंबर होने से दस्तावेज पूरी तरह संदिग्ध पाए गए।
मौत की वजह और बीमारी में कोई संबंध नहीं
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि बीमा कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही है कि कथित बीमारी का संबंध व्यक्ति की मृत्यु के वास्तविक कारण से था। रिकॉर्ड के मुताबिक समुंदर सिंह की मौत का मुख्य कारण दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ना था। सभी विधिक पहलुओं और साक्ष्यों पर बारीकी से विचार करने के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने परमानेंट लोक अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए बीमा कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया, जिससे अब पीड़ित महिला को न्याय मिल सकेगा।

