पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पारिवारिक मजबूरियों के चलते नौकरी से इस्तीफा देने वाले कर्मचारियों को पेंशन लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता है।

चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कर्मचारी हित में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने नए आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी गंभीर पारिवारिक मजबूरियों के चलते अपनी नौकरी से इस्तीफा देता है, तो उसे महज अत्यधिक तकनीकी आधार पर पेंशन और अन्य जरूरी सेवानिवृत्ति लाभों से बिल्कुल भी वंचित नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने हरियाणा न्याय विभाग में कार्यरत रहे एक स्टेनो टाइपिस्ट को उसकी 13 वर्ष की बेदाग सेवा के अनुपात में पूरी पेंशन, डीसीआरजी (डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रेच्युटी) तथा अन्य सभी महत्वपूर्ण रिटायरल लाभ निर्धारित समय में जारी करने के सख्त आदेश दिए हैं।

हाई कोर्ट का व्यावहारिक दृष्टिकोण

इस मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए जस्टिस कुलदीप तिवारी ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता पंकज मेहता ने विभाग में 13 वर्षों तक अपनी निष्कलंक सेवाएं दी हैं। पूरी नौकरी के दौरान उनके खिलाफ कभी भी कोई भी विभागीय जांच या अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। ऐसे साफ-सुथरे सेवा रिकॉर्ड वाले मामले में अदालत केवल “हाइपर-टेक्निकल” यानी अत्यधिक तकनीकी और संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने की बजाय व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य है। तथ्यों के अनुसार पंकज मेहता को सितंबर 1999 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा नियमित पद पर स्टेनो टाइपिस्ट नियुक्त किया गया था।

पेंशन लाभ का ऐतिहासिक विवाद

पंकज मेहता ने साल 2012 में गंभीर पारिवारिक परिस्थितियों के कारण एक माह का एडवांस वेतन जमा करवाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसे विभाग द्वारा तीन अक्टूबर 2012 को स्वीकार भी कर लिया गया था। इसके लगभग छह वर्ष बाद अगस्त 2018 में उन्होंने नियमानुसार अनुपातिक पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभों की मांग को लेकर एक आवेदन दिया, लेकिन संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों ने पंजाब सिविल सेवा नियमों तथा हरियाणा अक्षमता सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 2016 का हवाला देते हुए उनके इस जायज दावे को सिरे से खारिज कर दिया था।

कर्मचारी की अदालत में जीत

इसके बाद पंकज मेहता ने न्याय के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उनके वकील ने दलील दी कि इस्तीफे से जुड़े कड़े नियम केवल उन कर्मचारियों पर लागू होते हैं जो बर्खास्तगी या किसी बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई से बचने के लिए पद छोड़ते हैं। दूसरी ओर, जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय ने तर्क दिया कि इस्तीफा देने के कारण सेवा स्वतः समाप्त मानी जाएगी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने पुराना आदेश रद्द करते हुए अधिकारियों को चार महीने के भीतर सेवा अवधि के अनुपात में पेंशन और डीसीआरजी जारी करने के निर्देश दिए हैं।