चंडीगढ़। हाईकोर्ट ने मेडिकल रीइंबर्समेंट से जुड़े मामलों में स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मियों और पेंशनरों के चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति केवल तकनीकी आधारों पर खारिज नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रीइंबर्समेंट पालिसी का उद्देश्य मानव कल्याण को बढ़ावा देना है, न कि उन्हें नौकरशाही की तकनीकी बाधाओं में उलझाकर निष्प्रभावी बनाना।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने अपने फैसले में प्राचीन संस्कृत वाक्यांश ‘सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ का उल्लेख कर कहा कि कल्याणकारी राज्य की संवैधानिक अवधारणा इसी शाश्वत भारतीय विचारधारा से शक्ति प्राप्त करती है। इसका मूल सिद्धांत यह है कि समाज का कल्याण उसके नागरिकों के स्वास्थ्य और गरिमा से अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है।
राज्य की जिम्मेदारी है कि ऐसी नीतियां न्याय को आगे बढ़ाने का माध्यम बनें, न कि उसमें बाधा उत्पन्न करें। हाईकोर्ट का यह फैसला उन कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया, जिनमें सरकारी कर्मियों और पेंशनरों द्वारा गैर-पैनल निजी अस्पतालों में इलाज कराने, पीजीआई दरों तक प्रतिपूर्ति सीमित किए जाने तथा प्रतिपूर्ति पैकेजों एवं पात्रता शर्तों को लेकर विवाद उठाए गए थे।

कोर्ट ने कहा कि स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देकर कहा कि राज्य अपने कर्मियों के चिकित्सा खर्च वहन करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है। यद्यपि पीजीआई जैसे संस्थान उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं, पर वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने बताया कि अतिरिक्त निदेशक स्वास्थ्य सेवाएं की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है, जो दावों की जांच करेगी।
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