हिमालय दिवस पर देहरादून में पर्यावरण संगठनों ने कार्यक्रम आयोजित कर हिमालय के अनियंत्रित दोहन, पेड़ों के कटान और बढ़ते मानवीय दबाव पर चिंता जताई. कार्यक्रम में बच्चों, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिमालय संरक्षण को पूरे साल जारी रखने की जरूरत बताई.
देहरादून. हिमालय दिवस के अवसर पर देहरादून में पर्यावरण संगठनों ने जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर हिमालय के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया. परेड ग्राउंड के पास हुए कार्यक्रम में सिटीजन फॉर ग्रीन देहरादून समेत कई पर्यावरण संस्थाओं के कार्यकर्ता, बच्चे, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी शामिल हुए.
कार्यक्रम में हिमालय के अनियंत्रित दोहन को लेकर चिंता जताई गई. बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं, सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों की कटिंग, पेड़ों के कटान और बढ़ते मानवीय दबाव को हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए गंभीर चुनौती बताया गया.
बच्चों ने दिया संदेश
कार्यक्रम में छोटे बच्चे हाथों में तख्तियां लेकर हिमालय बचाने का संदेश देते नजर आए. तख्तियों पर ‘हिमालय रहेगा, तभी जीवन बचेगा’ और आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय को बचाने की अपील जैसे संदेश लिखे थे.

बच्चों ने हिमालय की समस्याओं को लेकर अपनी बात भी रखी. उनके संदेशों में यह बात सामने आई कि हिमालय का सवाल केवल आज की पीढ़ी का नहीं, बल्कि आने वाले कल का भी है. कार्यक्रम में बच्चों की भागीदारी ने पर्यावरण संरक्षण की चर्चा को भावनात्मक दिशा दी.
नुक्कड़ नाटक से संदेश
कार्यक्रम के दौरान नुक्कड़ नाटक के जरिए हिमालय की मौजूदा चुनौतियों को लोगों के सामने रखा गया. नाटक में नेताओं, अधिकारियों, पर्यटकों और आम लोगों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए संदेश दिया गया कि हिमालय को नुकसान पहुंचाने के लिए किसी एक वर्ग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

पहाड़ों में बढ़ता पर्यटन, निर्माण गतिविधियां और प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता दोहन सामूहिक चिंता का विषय बताया गया. नाटक के जरिए यह समझाने की कोशिश की गई कि हिमालय को केवल पर्यटन और विकास के संसाधन के रूप में देखने के बजाय संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के तौर पर समझना होगा.
सालभर संरक्षण की जरूरत
सिटीजन फॉर ग्रीन देहरादून के संस्थापक और पर्यावरणविद् हिमांशु अरोड़ा ने कहा कि उनका संगठन लगातार शहर में ऐसे कार्यक्रमों के जरिए लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का प्रयास करता है. उन्होंने कहा कि हिमालय दिवस हो या हरेला, प्रकृति के नाम पर केवल एक दिन कार्यक्रम करना पर्याप्त नहीं है.
हिमांशु अरोड़ा ने कहा कि एक दिन हिमालय दिवस मनाने और बाकी पूरे साल पेड़ों को काटते रहने का सिलसिला बंद होना चाहिए. अगर वास्तव में हिमालय को बचाना है तो पेड़ों का कटान पूरी तरह रोकने की दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे.
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में जिस रफ्तार से पेड़ काटे जा रहे हैं, उस सिलसिले को कहीं न कहीं रुकना होगा. उत्तराखंड के पास अगर हिमालय ही नहीं रहेगा तो इस प्रदेश की कल्पना करना भी मुश्किल होगा.
दून घाटी पर चिंता
वरिष्ठ इतिहासकार लोकेश ओहरी ने कहा कि हिमालय की स्थिति का आकलन देहरादून शहर से भी किया जा सकता है. दून घाटी शिवालिक हिमालय के महत्वपूर्ण भूभाग का हिस्सा है और इसके दोनों ओर गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियां बहती हैं.
उन्होंने कहा कि हिमालय का लगातार क्षरण और बढ़ती आपदाएं अब दून घाटी के लिए भी चिंता का विषय हैं. हिमालय में होने वाले बदलावों का असर मैदानों तक पहुंच रहा है और देहरादून भी इससे अछूता नहीं है.
जलवायु न्याय का मुद्दा
समाजसेवी अनूप नौटियाल ने जलवायु न्याय का मुद्दा उठाते हुए कहा कि नेपाल में हुई घटना के बाद क्लाइमेट इनजस्टिस की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है. उनके मुताबिक हिमालय दुनिया के सबसे बड़े मीठे पानी के भंडारों में से एक है, लेकिन आज वह उस कार्बन उत्सर्जन की कीमत चुका रहा है, जो उसने खुद नहीं किया.
उन्होंने कहा कि यही स्थिति उत्तराखंड में भी दिखाई देती है. देश में उत्तराखंड का कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है और प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र मैदानों की तुलना में भी कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर हिमालयी क्षेत्रों को झेलना पड़ रहा है.
अनूप नौटियाल ने कहा कि आने वाले चुनाव में हिमालय और हिमालयी लोगों के साथ हो रहे इस जलवायु अन्याय का मुद्दा भी गंभीरता से उठना चाहिए. कार्यक्रम में लगे पोस्टरों और तख्तियों में भी यह सवाल उभरकर सामने आया कि ‘हिमालय केवल हमारी विरासत नहीं, हमारी जिम्मेदारी भी है’.
हिमालय दिवस पर देहरादून की सड़क से उठी यह आवाज उस भविष्य की चिंता से जुड़ी है, जिसमें पहाड़, जंगल, नदियां और आने वाली पीढ़ियां एक-दूसरे से अलग नहीं हैं.



