दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने बच्चों की कस्टडी और माता-पिता के बीच विवाद से जुड़े मामलों में अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि माता-पिता के आपसी विवाद में बच्चे को फुटबॉल की तरह एक-दूसरे के पाले में नहीं उछाला जा सकता। बच्चे के हितों को प्राथमिकता देते हुए उसके समुचित विकास के लिए माता-पिता दोनों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के बीच मतभेद का असर बच्चे की देखभाल और उसके भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए। बच्चे को दोनों अभिभावकों का प्यार, स्नेह और मार्गदर्शन मिलना उसके विकास के लिए जरूरी है।
बालिग होने तक माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस रेणु भटनागर की पीठ ने बच्चे को किसी एक पक्ष के सुपुर्द करने की परंपरा पर नाराजगी जताते हुए कहा कि इसे बदलने की जरूरत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के विवाद में बच्चे को सौदेबाजी का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने अपने विशेष अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया कि बच्चे के बालिग होने तक माता और पिता, दोनों को उसके संपर्क में रहना होगा। बच्चे की कस्टडी चाहे किसी एक अभिभावक के पास हो, दूसरे अभिभावक को भी बच्चे से मुलाकात करने, उसके साथ संपर्क बनाए रखने और उसकी देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियां निभानी होंगी। अदालत के अनुसार, तलाक के दौरान किया गया समझौता बच्चे को माता-पिता में से किसी एक के प्यार और साथ से पूरी तरह वंचित करने का आधार नहीं बनना चाहिए।
माता-पिता का प्यार बच्चे का बुनियादी मानवाधिकार
हाईकोर्ट ने कहा कि कम उम्र के बच्चे को माता-पिता दोनों के प्यार, स्नेह, साथ और सुरक्षा की जरूरत होती है। यह केवल बच्चे की भावनात्मक आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसका एक बुनियादी मानवाधिकार भी है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि माता-पिता के वैवाहिक संबंध समाप्त होने के बावजूद बच्चे के प्रति उनकी जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं। बच्चे की देखभाल और उसके समुचित विकास में दोनों अभिभावकों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहती है। हाईकोर्ट का यह महत्वपूर्ण आदेश 12 अक्टूबर को पारित किया गया था और 15 अक्टूबर को अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया गया। आदेश में बच्चे की देखभाल और माता-पिता दोनों के साथ उसके संपर्क को लेकर निर्देश दिए गए हैं।
मध्यस्थता में बच्चे का नहीं होगा सौदा
दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक और मध्यस्थता के दौरान बच्चों की कस्टडी को लेकर होने वाले समझौतों पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी आपसी सहमति से ऐसा कोई समझौता नहीं कर सकते, जिससे बच्चे को अपने माता या पिता के साथ रहने अथवा संपर्क बनाए रखने से वंचित कर दिया जाए। ऐसे समझौते बच्चे के विकास और भावनात्मक वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच मध्यस्थता के जरिए होने वाले किसी भी समझौते में बच्चे को सौदेबाजी का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। अदालत ऐसे समझौतों को स्वीकार नहीं करेगी, जिनमें बच्चे के हितों की अनदेखी की गई हो।
बच्चे के नुकसान की कीमत पर बंद नहीं होंगे दरवाजे
हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे के नुकसान की कीमत पर किसी भी माता-पिता के लिए बच्चे से मिलने और संपर्क बनाए रखने के रास्ते बंद नहीं किए जा सकते। तलाक के बाद भी बच्चे को माता-पिता दोनों का प्यार, साथ और सुरक्षा मिलना जरूरी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों के हितों की रक्षा करना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है। इसके लिए अदालतें अभिभावक के रूप में राज्य की भूमिका निभाते हुए अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकती हैं और ऐसे समझौतों पर रोक लगा सकती हैं, जो बच्चे के हितों के खिलाफ हों।
पिता ने बच्चे से संबंध न रखने पर दी थी सहमति
इस मामले में पति-पत्नी की शादी वर्ष 2010 में हुई थी और जुलाई 2011 में उनके बच्चे का जन्म हुआ। बाद में दोनों के बीच अनबन होने लगी और वे अलग रहने लगे। सितंबर 2017 में दंपती ने आपसी समझौते के जरिए तलाक ले लिया। समझौते के तहत बच्चे की कस्टडी मां को सौंप दी गई थी। मध्यस्थता के जरिए हुए इस समझौते में पिता ने बच्चे से कोई संबंध नहीं रखने पर सहमति जताई थी। हालांकि, समझौते को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान नाबालिग बच्चे की कस्टडी का मुद्दा उठा। इस दौरान सामने आया कि बच्चे की कस्टडी पूरी तरह मां के पास थी और पिता ने उससे संबंध नहीं रखने की सहमति दी थी। मामले पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने पिता के लिए बच्चे से मुलाकात का समय निर्धारित किया। अदालत के निर्देश के अनुसार, पिता अब हर महीने के पहले और तीसरे शनिवार को दोपहर 3 बजे से शाम 5 बजे तक बच्चे से मुलाकात कर सकेगा।
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