दिल्ली की द्वारका जिला अदालत ने चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी दंपती को राहत देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने शिकायतकर्ता की ओर से ब्याज की गणना में हुई छोटी सी गलती को अहम मानते हुए कहा कि चेक की रकम वास्तविक कानूनी देनदारी से अधिक थी। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास शिव कुमार की अदालत ने आरोपी दंपती रुक्साना और मेनुद्दीन को बरी करते हुए कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कार्रवाई तभी संभव है, जब जारी किया गया चेक वास्तविक और वैध देनदारी के बराबर या उससे कम राशि का हो। मामले में शिकायतकर्ता ने चेक बाउंस होने के बाद कानूनी कार्रवाई शुरू की थी। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आया कि ब्याज की गलत गणना के कारण चेक में दर्ज राशि वास्तविक बकाया रकम से ज्यादा थी। अदालत ने कहा कि जब चेक की राशि ही वैध देनदारी से अधिक हो जाती है, तो धारा 138 के तहत अपराध का आधार कमजोर हो जाता है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी दंपती को दोषमुक्त कर दिया।
यह मामला वर्ष 2019 का है, जब शिकायतकर्ता रेणु देवी को किराये के मकान की तलाश थी। एक प्रॉपर्टी डीलर के माध्यम से उनकी मुलाकात रघुबीर नगर निवासी रुक्साना और उनके पति मेनुद्दीन से हुई थी। दोनों पक्षों के बीच मकान देने को लेकर बातचीत हुई और आरोपी दंपती ने तीन लाख रुपये सिक्योरिटी डिपॉजिट के तौर पर लेने का प्रस्ताव रखा। 6 मई 2019 को दोनों के बीच एक बंधक समझौता हुआ, जिसमें इस रकम को लोन के रूप में दर्ज किया गया।
समझौते के मुताबिक आरोपी दंपती को हर महीने 6 हजार रुपये ब्याज के रूप में भुगतान करना था। शुरुआत में रुक्साना और मेनुद्दीन ने दो महीने तक ब्याज की रकम दी, लेकिन इसके बाद भुगतान बंद कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने बकाया राशि की मांग की और मामला चेक बाउंस तक पहुंच गया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि भुगतान के लिए जारी किया गया चेक बैंक में लगाने पर बाउंस हो गया, जिसके बाद उन्होंने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत अदालत में शिकायत दर्ज कराई।
चेक पर लिखी राशि तय राशि से अधिक
अदालत ने दोनों पक्षों की मौजूदगी में जब मूलधन और ब्याज का हिसाब कराया, तो सामने आया कि पेश किया गया चेक वास्तविक देनदारी से अधिक राशि का था। मामले में शिकायतकर्ता रेणु देवी के अनुसार, मई 2019 से दिसंबर 2024 तक करीब 68 महीने का समय बीत चुका था। समझौते के मुताबिक हर महीने छह हजार रुपये ब्याज तय किया गया था। इस हिसाब से 68 महीनों का ब्याज 4.08 लाख रुपये बैठता है। इसमें तीन लाख रुपये की मूल राशि जोड़ने पर कुल देनदारी 7.08 लाख रुपये बनती है।
हालांकि, शिकायतकर्ता ने खुद स्वीकार किया था कि आरोपी दंपती ने शुरुआत में दो महीने का ब्याज यानी 12 हजार रुपये पहले ही चुका दिया था। इसके बाद वास्तविक बकाया राशि 6.96 लाख रुपये रह जाती थी। इसके बावजूद अदालत में जो चेक पेश किया गया, उसकी राशि 7.20 लाख रुपये थी। यानी चेक की रकम वास्तविक देनदारी से 24 हजार रुपये अधिक थी। अदालत ने माना कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कार्रवाई के लिए चेक की राशि वैध और वास्तविक देनदारी के अनुरूप होना जरूरी है। जब चेक की रकम ही देनदारी से अधिक पाई गई, तो मामले में अपराध की आवश्यक शर्त पूरी नहीं हुई।
खाता बंद होने से हुआ चेक बाउंस
चेक बाउंस के इस मामले में विवाद बढ़ने के बाद देनदारी चुकाने के लिए 30 जनवरी 2024 को 7.20 लाख रुपये का एक चेक जारी किया गया था। शिकायतकर्ता रेणु देवी ने जब इस चेक को बैंक में जमा किया तो वह ‘खाता बंद होने’ के कारण बाउंस हो गया। इसके बाद रेणु देवी ने आरोपी दंपती रुक्साना और मेनुद्दीन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की और अदालत में मामला दर्ज कराया। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने चेक बाउंस को लेकर अपनी दलीलें पेश कीं। वहीं, आरोपी दंपती ने अदालत में अपना बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने केवल तीन लाख रुपये का लोन लिया था। उनका दावा था कि उन्होंने सिक्योरिटी के तौर पर एक ब्लैंक चेक दिया था, जिसका इस्तेमाल बाद में अधिक राशि भरकर किया गया।
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