Your faith may be personal, but respect for faith is universal.” आराध्य चाहे जिस भी धर्म के हों वे सभी के लिए सम्माननीय होते हैं. किसी भी परिस्थिति और भावना से प्रेरित होकर कोई भी ऐसा कृत्य न करें कि किसी की आस्था आहत हो. त्योहार और पर्व विशेष में जानकारियों की कमी, नादानी, भुल, अतिउत्साह या अतिभावुकता के वशीभूत छोटी मगर गहरी भूल करते श्रद्धालुओं का हुजूम लग जाता है. स्मरण रहे ईश्वर की अपनी एक विशिष्ट गरिमा होती है, प्रत्येक श्रद्धालु के मन-मस्तिष्क में अपने आराध्य के लिए विशेष स्थान होता है. आँखों में बसी अपने देव की छबि में होने वाला तनिक सा बदलाव सच्चा भक्त पल भर के लिए भी स्वीकार नही कर सकता.

विशेष रूप से कृष्ण जन्माष्टमी और गणेशोत्सव में धार्मिक मर्यादाओं को लांघने वाले बहुत से ऐसे लोग प्रकट होते हैं. करोड़ों आस्थाओं के केंद्र भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव में सोशल मीडिया मोर पंख लगाए हुए पालतू पशुओं के चित्रों से पटने लगते हैं. गणेशोत्सव में अनेक स्थानों में विघ्नहर्ता भगवान गणेश की प्रतिमा के साथ बहुत ही भोंडा प्रयोग देखने को मिलता है.

भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति. तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ इसका अर्थ भी यही कि जो व्यक्ति मुझे हर जगह देखता है और समस्त जगत को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी दूर नहीं होता. इसमें कोई दो मत नहीं है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं. आप अपने मन में ईश्वर का ध्यान जिस रूप में भी करे इससे परमपिता परमेश्वर को कोई आपत्ति नही है क्यों कि वे भाव के भूखे हैं मगर कृपा कर के इसे सार्वजनिक ना करें. अपने व्यक्तिगत रुझान और स्नेह से आप करोड़ों हृदय में बसे ईश्वर की मूरत को खंडित करने का कुत्सित प्रयास ना करें. मनोवैज्ञानिकों का भी ऐसा ही मानना है कि चिरपरिचित चित्र से मन के भाव का गहरा नाता होता है.

भगवद्गीता का एक प्रसिद्ध श्लोक है अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः.अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ जिसमें श्री कृष्ण ने कहा है मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ. मैं ही सभी का आदि, मध्य और अंत हूँ. उनके इस कथन से स्पष्ट है कि जगत के सभी जीव उनके ही अंश हैं. कुत्ते, बिल्ली, वराह जैसे ना जाने कितने जीव हैं जिनको हमारे धर्म ग्रंथों में भी विशेष स्थान प्राप्त है. सभी जीव मात्र सम्मान और प्रेम के पात्र है. मगर फिर भी जिस तरह विष्णु जी के ही वराह अवतार की तुलना उन्हीं के रामावतार से नही की जा सकती उसी तरह जगत व्यापी ईष्ट के जगत प्रसिद्ध आभूषण, पोशाक और उनकी पहचान से अपने पालतू पशुओं का श्रृंगार कर उसका सार्वजनिक तौर पर प्रचार नही किया जा सकता. भारतीय मूल का निवासी आमतौर पर सभी धर्मों और सभी देवताओं के प्रति सहिष्णु होता है, सभी के लिए आदर का भाव रखता है और वह कोई ऐसा कृत्य नही करेगा जिससे किसी कि आस्था चोटिल होती हो. इसी पूर्वाग्रह के चलते भारत में ईशनिंदा कानून (Blasphemy Law) को उतना कठोर नही बनाया गया है जैसा कि अन्य राष्ट्रों में होता है. ईशनिंदा कानून वह कानूनी प्रावधान है जो ईश्वर, धर्म, धार्मिक प्रतीकों, पवित्र ग्रंथों का अनादर, पूजनीय हस्तियों का अपमान या निंदा, किसी धर्म या आस्था के खिलाफ अपमानजनक शब्द, लेख, कार्टून, वीडियो या वह कृत्य जिससे किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचे उसे अपराध घोषित करता है.

पाकिस्तान, ऑस्ट्रिया और जर्मनी जैसे कठोर धार्मिक आस्था वाले दुनिया के कई देशों में इस कानून के तहत भारी जुर्माना, कैद, उम्रक़ैद यहाँ तक कि मृत्युदंड का भी प्रावधान है. भारत में भी पूर्ववर्ती आईपीसी की धारा 295ए और नए भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की सुसंगत धाराओं के तहत जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने या धार्मिक अपमान करने पर कानूनी कार्रवाई और सजा का प्रावधान है. मगर सभी से अपेक्षा यही है कि नैतिक दायित्व समझते हुए स्वयं के विवेक का प्रयोग करते हुए ऐसा कोई काम ना क़रें कि किसी के मर्म को चोंट लगे. अपने ही ईष्ट का हम ही उपहास करें इससे बड़ी कुबुद्धि और क्या हो सकती है. अपनी संस्कृति अपने संस्कार की खिल्ली उड़ाने का दूरगामी परिणाम यह होता है कि आपके राष्ट्र से प्रतिस्पर्धा या बैर भाव रखने वाले देशों को आप की जन्मभूमि पर हंसने और उसे नीचा दिखाने का मौक़ा मिल जाता है. जो राष्ट्र अपनी संस्कृति और संस्कार को लेकर गौरवान्वित होगा वही राष्ट्र भविष्य में पल्लवित और पुष्पित होगा.


संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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