नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) को डेप्रिवेशन प्वाइंट के आधार पर छात्रों को दाखिला देने की अनुमति दे दी है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने मंगलवार को निर्देश दिया कि विश्वविद्यालय अपने 2026-27 ई-प्रास्पेक्टस में निर्धारित नियमों के अनुसार दाखिला प्रक्रिया जारी रखे। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश के बाद होने वाले सभी दाखिले मामले के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगे।

एकल पीठ के आदेश को JNU ने दी थी चुनौती

दरअसल, न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकल पीठ ने 14 अगस्त को अंतरिम आदेश जारी करते हुए JNU को डेप्रिवेशन प्वाइंट के आधार पर दाखिला देने से रोक दिया था। एकल पीठ ने प्रथम दृष्टया माना था कि इस व्यवस्था के जरिए CUET में उम्मीदवारों के प्राप्त अंकों में बदलाव होता है, जिससे प्रतियोगी परीक्षा के मूल स्कोर की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसके बाद JNU ने इस आदेश को मुख्य पीठ के समक्ष चुनौती दी।

क्या है डेप्रिवेशन प्वाइंट?

डेप्रिवेशन प्वाइंट JNU की एक पुरानी प्रवेश नीति है, जिसका उद्देश्य देश के विभिन्न और अपेक्षाकृत वंचित क्षेत्रों से छात्रों की भागीदारी बढ़ाना है। विश्वविद्यालय के 2026-27 प्रास्पेक्टस के अनुसार, पात्र उम्मीदवारों को अधिकतम 12 डेप्रिवेशन प्वाइंट दिए जा सकते हैं। हर प्वाइंट तीन अंकों के बराबर है। इस तरह पात्र उम्मीदवार के प्रवेश स्कोर में अधिकतम 36 अतिरिक्त अंक जुड़ सकते हैं।

1974 से लागू है JNU की नीति

JNU ने हाई कोर्ट में दलील दी कि डेप्रिवेशन प्वाइंट की व्यवस्था 1974 से लागू है और इसका उद्देश्य देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रतिनिधित्व देना है। विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि एकल पीठ के आदेश के कारण पूरी JNU Admission 2026 प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। मुख्य पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान एकल पीठ से कार्यवाही में तेजी लाने और मामले का जल्द निपटारा करने का अनुरोध किया है।

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