कानपुर. कानपुर में दशहरे पर एक ओर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं दूसरी ओर शिवाला स्थित दशानन मंदिर में रावण की पूजा होती है. साल में सिर्फ एक बार खुलने वाले इस मंदिर के कपाट आज मंगलवार (20 अक्टूबर 2026) को दशहरे के मौके पर खोले गए. इसके बाद रावण की प्रतिमा का दूध, दही और शहद से अभिषेक किया गया. श्रद्धालुओं ने आरती उतारी और दीपक जलाकर दर्शन किए.
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साल में एक दिन खुलते हैं मंदिर के कपाट
शिवाला की फूलमंडी के पास स्थित इस मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया. मंदिर के पुजारी राम बाजपेई के मुताबिक, यह मंदिर करीब 200 साल पुराना है. इसके कपाट साल में केवल दशहरे के दिन खोले जाते हैं. दिनभर पूजा-अर्चना के बाद शाम को इन्हें फिर बंद कर दिया जाता है. मंदिर के निर्माण का वर्ष 1865 भी बताया जाता है.
पुजारी बोले- रावण नहीं, उसके अहंकार को जलाते हैं
पुजारी राम बाजपेई ने कहा कि शाम को रावण नहीं, बल्कि उसके अहंकार को जलाया जाता है. उनके मुताबिक, अहंकार नहीं होता तो रावण को जन्म नहीं लेना पड़ता. उन्होंने बताया कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से मंदिर में पूजा करता आ रहा है. श्रद्धालु यहां बल, बुद्धि और विवेक की कामना करते हैं.
दिल्ली और उन्नाव से भी पहुंचे श्रद्धालु
मंदिर में दर्शन के लिए दिल्ली और उन्नाव से भी लोग पहुंचे. दिल्ली के पालम से आए शिवा ने बताया कि उन्होंने मंदिर के बारे में काफी सुना था. इसलिए वह दशहरे पर दर्शन करने आए. उन्नाव से आए मोहित मिश्रा ने रावण की बुद्धि और विवेक को अद्वितीय बताया.
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विद्वत्ता और शिवभक्ति के लिए होती है पूजा
मंदिर में रावण को उसकी विद्वत्ता और भगवान शिव के प्रति भक्ति के लिए पूजा जाता है. मान्यता है कि यहां दर्शन और सरसों के तेल का दीपक जलाने से बुद्धि, शक्ति और आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है. कुछ महिलाएं वैवाहिक सुख की कामना से भी पूजा करती हैं. जहां दशहरे पर रावण दहन को अहंकार और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है, वहीं इस मंदिर में उसके ज्ञान और शिवभक्ति को सम्मान दिया जाता है.

