अमित पाण्डेय, खैरागढ़। खैरागढ़ के बहुचर्चित एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क, नजूल भूमि और मेंटेनेंस खसरा विवाद में अब एक नया और महत्वपूर्ण मोड़ आ गया है। अब तक मामला सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पार्क, छोटे झाड़ के जंगल, घास भूमि और सार्वजनिक उपयोग की जमीन की कथित खरीद-बिक्री तथा अवैध प्लाटिंग तक सीमित माना जा रहा था, लेकिन टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (टीसीपी) के अधिकृत नक्शे के सामने आने के बाद विवाद का दायरा और बढ़ गया है। अब सवाल केवल जमीन के मालिकाना हक का नहीं, बल्कि भूमि उपयोग (लैंड यूज) के संभावित उल्लंघन का भी बन गया है।

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मामले से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार राजनांदगांव-कवर्धा मुख्य मार्ग पर स्थित प्लॉट नंबर 114 और 115, मूल खसरा नंबर 169 तथा आसपास के खसरा नंबर 167 और 170 लंबे समय से विवाद के केंद्र में हैं। पुराने राजस्व और नजूल अभिलेखों में प्लॉट नंबर 114 को “एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” और प्लॉट नंबर 115 को “बाड़ी एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” के रूप में दर्ज बताया गया है। स्थानीय इतिहास के अनुसार आजादी से पहले इस क्षेत्र को “अल्फ्रेड पार्क” के नाम से जाना जाता था। बाद में यहां राजा लालबहादुर सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिसे बाद में डोंगरगढ़ स्थित लाल निवास में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद धीरे-धीरे पूरी जमीन निजी स्वामित्व और प्लाटिंग के विवाद में घिरती चली गई।

1974 की रजिस्ट्री से शुरू हुआ विवाद

विवाद के केंद्र में वर्ष 1974 की एक पंजीकृत रजिस्ट्री भी है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार तत्कालीन राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह द्वारा अवयस्क स्मृति सिंह के नाम प्लॉट नंबर 114 और 115 की रजिस्ट्री की गई थी। रजिस्ट्री में भूमि का उल्लेख “एडवर्ड पार्क” और “बाड़ी एडवर्ड पार्क” के रूप में दर्ज बताया गया है। उस समय जमीन का मूल्य मात्र तीन हजार रुपये दर्शाया गया था। भूमि स्वामी पक्ष का दावा है कि उनके पास वैध रजिस्ट्री, सीमांकन प्रतिवेदन और राजस्व अभिलेख उपलब्ध हैं, जबकि दूसरी ओर जांच रिपोर्टों और सरकारी रिकॉर्ड में भूमि के स्वरूप को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

22 टुकड़ों में बंटी जमीन, 17 लोगों के नाम दर्ज

तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारी की संयुक्त जांच रिपोर्ट के अनुसार लगभग एक लाख वर्गफीट से अधिक भूमि को करीब 22 हिस्सों में विभाजित कर विभिन्न लोगों के नाम दर्ज किया गया। जांच में लगभग 85,627 वर्गफीट भूमि की खरीदी-बिक्री का उल्लेख है। वर्तमान में वहां 17 कब्जाधारियों की मौजूदगी और कई स्थायी निर्माण होने की बात भी सामने आई है। वर्तमान बाजार दर के हिसाब से इस भूमि का मूल्य 40 करोड़ रुपये से अधिक आंका जा रहा है।

नगर निवेश विभाग पहले ही बता चुका है अवैध प्लाटिंग

नगर एवं ग्राम निवेश विभाग (टीसीपी) पहले ही अपनी जांच में स्पष्ट कर चुका है कि संबंधित भूमि का कोई स्वीकृत ले-आउट उपलब्ध नहीं है। विभाग ने प्लाटिंग प्रक्रिया को अवैध श्रेणी में माना था। इसके बाद कलेक्टर कार्यालय की नजूल शाखा ने 29 सितंबर 2025 को नगर पालिका परिषद को नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश भी जारी किए थे। बावजूद इसके अब तक न तो किसी बड़ी कार्रवाई की जानकारी सामने आई है और न ही अवैध प्लाटिंग से जुड़े लोगों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज होने की पुष्टि हुई है।

टीसीपी नक्शे ने बढ़ाई मुश्किलें

अब सामने आए टीसीपी के अधिकृत नक्शे ने पूरे विवाद को नई दिशा दे दी है। नक्शे के अनुसार खसरा नंबर 169 को वाणिज्यिक (कॉमर्शियल) उपयोग के लिए आरक्षित दिखाया गया है, जबकि खसरा नंबर 167 सार्वजनिक एवं अर्द्ध-सार्वजनिक उपयोग की भूमि के रूप में दर्ज है। इसके अलावा आसपास के हिस्सों को पार्क और आमोद-प्रमोद क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है।

यही वह बिंदु है जिसने पूरे मामले को और जटिल बना दिया है। यदि भूमि का उपयोग व्यावसायिक, सार्वजनिक अथवा पार्क के लिए निर्धारित था, तो वहां रिहायशी प्लॉट काटकर कॉलोनी विकसित कैसे हो गई? क्या भूमि उपयोग परिवर्तन (लैंड यूज चेंज) की प्रक्रिया पूरी की गई थी? यदि की गई थी तो उसके दस्तावेज कहां हैं? और यदि नहीं की गई, तो वर्षों तक रजिस्ट्रियां, नामांतरण और निर्माण कार्य कैसे चलते रहे?

मंत्री स्तर तक पहुंच चुका है मामला

मामला अब शासन स्तर तक पहुंच चुका है। राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा पहले ही शिकायत और जांच प्रतिवेदन मंगाने की बात कह चुके हैं। वहीं जिले के प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने भी दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों की समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई के संकेत दिए हैं। इससे पहले वर्ष 2020 में तत्कालीन विधायक स्वर्गीय देवव्रत सिंह ने भी विधानसभा में कथित अवैध प्लाटिंग का मुद्दा उठाया था।

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कार्रवाई के आदेश, लेकिन जमीन पर असर नहीं

विवाद का सबसे बड़ा पहलू यह है कि जांच रिपोर्टें तैयार हो चुकी हैं, विभागीय पत्राचार हो चुका है, नगर पालिका को कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके हैं, लेकिन अब तक जमीन पर किसी बड़ी कार्रवाई के संकेत नहीं मिले हैं। नगर पालिका द्वारा जारी भवन अनुज्ञा की शर्तों में भी यह प्रावधान है कि यदि कोई भूखंड अवैध प्लाटिंग का हिस्सा पाया जाता है तो उसकी अनुमति स्वतः निरस्त मानी जाएगी। इसके बावजूद किसी भवन अनुमति के निरस्तीकरण या निर्माण को अवैध घोषित किए जाने की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।

जिला स्तरीय जांच टीम करेगी पूरे मामले की पड़ताल

इस बीच संयुक्त कलेक्टर सुरेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सूक्ष्म विश्लेषण और विस्तृत जांच के लिए जिला स्तरीय अधिकारियों की टीम गठित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह टीम राजस्व अभिलेखों, भूमि उपयोग, रजिस्ट्रियों, प्लाटिंग की वैधता, विभागीय अनुमतियों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका सहित पूरे प्रकरण की जांच करेगी।

खैरागढ़ में अब यह विवाद केवल भूमि स्वामित्व का नहीं रह गया है। यह सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता, सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा, नगर नियोजन नियमों के पालन, प्रशासनिक जवाबदेही और करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि के उपयोग से जुड़ा बड़ा मामला बन चुका है। अब पूरे शहर की निगाहें जिला स्तरीय जांच टीम की रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

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